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(मोहित मिश्र)
मेजर जनरल कुलदीप सिंह बरार ने एक टीवी इंटरव्यू में बताया था कि शादी के बाद वो हनीमून के लिए फ़िलीपीन्स की राजधानी मनीला जाने के लिए पूरी तरह तैयार थे, उनकी टिकट और ट्रैवलर्स चेक आ चुके थे, और कुछ ही घंटों बाद उनकी फ्लाइट थी, लेकिन अचानक एक फ़ोन आया और तुरंत उन्हें चंडीगढ़ के पास चंडीमाता मंदिर आने को कहा गया, यहीं II Corps ( टू कोर ) का मुख्यालय हुआ करता था. जनरल बरार को ब्रीफ़िंग दी गई, और उन्हें कहा गया कि वो तुरंत अपनी डिवीज़न मेरठ से अमृतसर ले जाएं, भिंडरावाले किसी भी दिन खालिस्तान का ऐलान कर सकता है. आज़ाद भारत के लिए ये सबसे नाज़ुक पलों में से एक था. जनरल बरार की ये दलील भी दरक़िनार कर दी गई कि उन्हें कुछ ही घंटों बाद हनीमून के लिए निकलना था. वक्त उस दौरान सबसे क़ीमती चीज़ थी. दिन था 1 जून 1984.

हरमिंदर साहब, अमृतसर
कांग्रेस के शुरूआती समर्थन के बाद जरनैल सिंह भिंडरावाला सिखों के बीच अच्छी खासी ताक़त रखने लगा था. कांग्रेस ने भिंडरावाले को अकाली राजनीति के सामने खड़ा किया था. लेकिन बात हाथ से निकल गई थी. भिंडरावाले ने 1984 से पहले ही अकाल तख़्त को अपना केंद्र बना लिया था. वो यहीं से अपने विचार रखता, जिसके निशाने पर केंद्र की सरकार भी थी. 1984 तक आते-आते पंजाब में आतंकवाद उफ़ान पर आ चुका था. सत्ता और आतंक के केंद्र में जरनैल सिंह भिंडरावाले ही था.

सरकार अकाली दल से भिंडरावाले को हथियार डालने के लिए कह रही थी. सरकार और अकालियों के बीच बातचीत किसी नतीजे तक नहीं पहुंच रही थी. अकाली भी भिंडरावाले के सामने बेअसर दिखने लगे थे. हालात बेकाबू हो रहे थे. और न चाहते हुए भी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को स्वर्ण मंदिर परिसर से हथियारबंद उग्रवादियों को निकालने के लिए ऑपरेशन की मंज़ूरी देनी पड़ी. 2 जून को प्रधानमंत्री ने ऑल इंडिया रेडियो से पंजाब के सभी घटकों से अपील की कि हिंसा और नफरत छोड़ दें. हालात तेज़ी से बिगड़ रहे थे. 3 जून को पंजाब का सड़क, रेल और टेलीफोन संपर्क काट दिया गया. विदेशी पत्रकारों से कहा गया कि वो अमृतसर छोड़ दें. कुछ ही किलोमीटर पर पाकिस्तान बॉर्डर को भी सील कर दिया गया.

3 जून को ही शहीद अर्जन सिंह का शहीदी दिवस था. कर्फ्यू में ढील की वजह से कई श्रद्धालु हरमिंदर साहब के दर्शन और परिक्रमा के लिए आए, जिनमें से कुछ ने रात में वहीं रहने का फ़ैसला किया. पत्रकार सुभाशीष किरपेकर भिंडरावाले से मिलने वाले शायद आखिरी पत्रकार थे. उन्होंने किताब द पंजाब स्टोरी में लिखा है, “मैं 3 जून की शाम को स्वर्ण मंदिर गया. नंगे पांव हरमिंदर साहब की परिक्रमा करने के बाद मैंने गुरू ग्रंथ साहिब के सामने माथा टेका और प्रार्थना की. थोड़ा सा चढ़ावा भी चढ़ाया. मैंने अपना हाथ प्रसाद ग्रहण करने के लिए आगे बढ़ाया तो मैं इस बात से चौंका कि मुझे आगे बढ़ने के लिए बोला गया. मैं बहस नहीं करना चाहता था. अकाल तख्त में अंदर जाते वक्त भिंडरावाले के रक्षकों ने सीढ़ियों के तल में मेरी तलाशी ली. मुझे बताया गया कि संत जी अपने शिष्यों से बात कर रहे हैं. थोड़ी देर बाद मुझे इंटरव्यू लेने के लिए अंदर बुलाया गया.”

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किरपेकर के इंटरव्यू में भिंडरावाले ने कहा कि उसे लगता था कि सेना परिसर में नहीं घुसेगी, वो भी सीआरपी और बीएसएफ़ की तरह परिसर के बाहर ही डेरा डालेगी, जैसा पिछले दो साल से चल रहा था. भिंडरावाले ने किरपेकर को एक बुज़ुर्ग सिख से मिलवाया और पूछा, आप जानते हो ये कौन हैं? किरपेकर के इनकार करने के बाद उन्हें बताया गया कि ये पूर्व मेजर जनरल शाहबेग सिंह हैं.

शाहबेग सिंह
बांग्लादेश जंग से पहले मुक्ति वाहिनी के लड़ाकों को ट्रेनिंग दे चुके शाहबेग सिंह को परम विशिष्ट सेवा मेडल और अति विशिष्ट सेवा मेडल से नवाज़ा जा चुका था. द्वितीय विश्व युद्ध, 1947 का भारत-पाक, 1962 का भारत-चीन युद्ध लड़ चुके शाहबेग को उनके रिटायरमेंट से सिर्फ 1 दिन पहले भ्रष्टाचार के आरोपों पर बिना कोर्ट मार्शल के सेना से बर्ख़ास्त कर दिया गया था. शाहबेग फिर भिंडरावाले के सैन्य सलाहकार बन गए. स्वर्ण मंदिर की सुरक्षा और बाड़ेबंदी शाहबेग के ही ज़िम्मे थी. शाहबेग को अंदाज़ा हो गया था कि रात को ही सेना अपना ऑपरेशन शुरू कर सकती है.

भिंडरावाले के हथियार
भिंडरावाले के लोगों और हथियारों का अंदाज़ा लगाने के लिए एक ख़ुफ़िया अधिकारी को सादे कपड़ों में स्वर्ण मंदिर के अंदर भेजा गया. जनरल बरार ने एक इंटरव्यू में कथित तौर पर दावा किया था कि उन्हें मिली ख़ुफ़िया सूचना अधूरी थी. सेना को अंदाज़ा ही नहीं था कि भिंडरावाले के समर्थकों के पास कितने हथियार हैं. भिंडरावाले के समर्थकों के पास एके-47 समेत कई ऑटोमैटिक हथियार, और हथगोले थे. उस वक्त छपी खबरों के मुताबिक, भिंडरावाले के समर्थकों के पास से 5 मीडियम मशीन गन, 20-25 लाइट मशीनगन, 200 राइफ़ल, 50 स्टेन गन, एंटी टैंक मिसाइल और रॉकेट लॉन्चर मिले थे. शाहबेग सिंह ने उन्हें एक मंझे हुए सैन्य अधिकारी की तरह ही तैनात किया.

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बांग्लादेश जंग में पाकिस्तान के जनरल नियाज़ी को सरेंडर करवाने वाले और भारत के सबसे शानदार सैन्य अधिकारियों में से एक ले.जन. जगजीत सिंह अरोड़ा ने किताब द पंजाब स्टोरी में लिखा है. सबसे पहले ये याद रखना ज़रूरी है कि जंग में हथियार गुम हो जाते हैं. पाकिस्तान के साथ 1965 और 1971 के युद्ध में भी बड़ी संख्या में हथियार खो गए थे. इसके अलावा 1960 के दशक से ही सरहद के पास के इलाकों में कुछ भरोसेमंद लोगों को हथियार दिए गए थे, जिनका हिसाब नहीं रखा गया. ऐसे में पंजाब में बिना हिसाब वाले काफ़ी हथियार पहले से ही मौजूद थे.

ऑपरेशन की तैयारी
5 जून को तड़के 4.30 बजे मेजर जनरल बरार ने उन बटालियन से मुलाकात करनी शुरू की, जो स्वर्ण मंदिर में ऑपरेशन करने वाली थीं. उन्होंने सभी बटालियन से एक-एक करके पूछा कि अगर कोई सैनिक ऑपरेशन ना करना चाहे तो उसे इसकी आज़ादी होगी और उस पर अनुशासनात्मक कार्रवाई भी नहीं होगी. मेजर जनरल बरार ने एक इंटरव्यू में बताया था, “पहली 3 बटालियन में खुद को इस ऑपरेशन से बाहर रखने के लिए कोई आगे नहीं आया. लेकिन चौथी बटालियन में एक सिख अधिकारी ने अपना हाथ खड़ा किया. जनरल बरार ने उस अधिकारी से कहा, अगर आप बाहर जाना चाहते तो बेझिझक जाइए, आप पर कोई ऐक्शन नहीं लिया जाएगा. लेकिन अधिकारी ने कहा, आप मुझे गलत समझ रहे हैं, मैं सेकंड लेफ्टिनेंट जसबीर सिंह रैना हूं, और मैं चाहता हूं कि अकाल तख़्त में सबसे पहले मैं ही जाकर भिंडरावाले को पकड़ूं. मैंने यूनिट को कमांड करने वाले लेफ्टनेंट कर्नल मोहम्मद इसरार से कहा कि रैना को ही इस चार्ज का नेतृत्व दिया जाना चाहिए.” भारी गोलाबारी की वजह से रैना गंभीर रूप से घायल हो गए, लेकिन पीछे हटने को तैयार नहीं थे. बाद में उनके दोनों पैरों को काटना पड़ा था. लेकिन इस अदम्य साहस के लिए उन्हें अशोक चक्र प्रदान किया गया, जो शांतिकाल में सबसे बड़ा सैनिक सम्मान है.

ऑपरेशन सूरज उगने से पहले ही शुरू हो गया. 10 बजे के आसपास भिंडरावाले की ओर से हमला शुरू कर दिया गया. सेना को आदेश दिए गए कि वो जल्द से जल्द अकाल तख़्त पहुंचे. यहां जनरल शाहबेग की मोर्चाबंदी की वजह से सैनिकों पर ऑटोमैटिक बंदूकों से भारी गोलाबारी की गई. ज़्यादातर सैनिक शहीद हो गए. उनकी मदद के लिए जाने वाले सैनिकों पर भी सरोवर की दूसरी तरफ़ से हमला किया गया. बाद में जनरल बरार ने बताया कि उन्हें पहले 45 मिनट में ही समझ आ गया था कि आतंकियों की योजना उनके अंदाज़े से कहीं ज़्यादा है और ऑपरेशन काफ़ी मुश्किल रहने वाला है. सैनिकों पर कई तरफ से गोलियां चल रहीं थीं. आगे बढ़ने का रास्ता नहीं था. यही नहीं, अलगाववादियों ने छुपी हुई जगहों से भी गोली चलाना शुरु किया तो सैनिकों का आगे बढ़ना नामुमकिन हो गया.

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6 जून शुरू होते ही रात 1 बजे शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अध्यक्ष जीएस टोहरा और अकाली दल के अध्यक्ष संत हरचंद सिंह लोंगोवाल ने सेना के सामने आत्मसमर्पण कर दिया. भारी गोलाबारी के बीच सेना के पास अब बख्तरबंद गाड़ियों के अलावा कोई चारा नहीं था. आर्मर्ड पर्सनल व्हीकल यानी ऐपीसी सुबह करीब सवा 4 बजे जैसे ही आगे बढ़ा, रॉकेट लॉन्चर से हमला कर उसे तबाह कर दिया गया. हेलीकॉप्टर से लगातार निगरानी भी जारी रही. सेना को मजबूरन टैंकों की मांग करनी पड़ी. वक्त निकला जा रहा था और सेना अकाल तख़्त से अब भी दूर थी. टैंकों की मांग इसलिए भी की गई क्योंकि उसमें लगे बल्बों की रोशनी से उग्रवादियों की आंखें चकाचौंध हो जातीं. आखिरकार मजबूरन अकाल तख़्त के ऊपर वाले हिस्से में टैंक से फ़ायरिंग का फैसला किया गया. हालांकि थोड़े ही समय बाद ये अंतर रह नहीं पाया. रिटा. जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा ने बाद में बताया कि अकाल तख़्त की पूरी इमारत पर कम से कम 80 गोले चलाए गए. इसकी एक वजह ये भी थी कि गोले चलाते वक्त दर्शनी ड्योढ़ी और अकाल तख़्त करीब-करीब एक ही सीध में थे.

6 जून की रात और 7 जून की शुरुआत में अकाल तख्त़ पर मोर्चा संभाले उग्रवादियों पर काबू पा लिया गया. इसके बाद अगले 3 दिन तक हरमिंदर साहब और अकाल तख़्त का क्लीनिंग ऑपरेशन चलाया गया. 48 सैनिक इस ऑपरेशन में शहीद हुए जबकि भिंडरावाले और शाहबेग सिंह जैसे 248 आतंकियों को मार गिराया गया.

ऑपरेशन ब्लू स्टार एक सैन्य अभियान था, इससे ज़्यादा और कुछ नहीं. भारत की संप्रभुता और अखंडता को चुनौती देने वाले भिंडरावाले ने बार-बार बातचीत और सरेंडर की अपील को नहीं माना, धर्म और हथियारों का वो मिश्रण तैयार किया जिसके बाद बहुत ज़्यादा रास्ते नहीं बचते थे.

Tags: Amritsar, Indian army, Punjab

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