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हाइलाइट्स

भारत के पहले प्रधानमंत्री नेहरू ज्योतिष पर विश्वास नहीं करते थे लेकिन उनके सहयोगी खूब करते थे
जब नेहरू से ज्योतिष से सलाह लेने को कहा गया तो उनकी प्रतिक्रिया क्या थी
ज्योतिष ने नेहरू को लेकर क्या बताए थे निष्कर्ष जो बाद में सही साबित हुए

भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ज्योतिष को नहीं मानते थे लेकिन आधी रात को देश की आजादी से लेकर आजतक सरकार और दिग्गज नेताओं के कार्यकलाप में ज्योतिषी सलाह का लेना देना जरूर रहता है. नेहरू को कई कांग्रेसी नेता विभिन्न मसलों और खासकर उनके स्वास्थ्य के बारे में ज्योतिषियों की सलाह का सुझाव दिया. हर बार वो मना कर देते थे. आखिर फिर ऐसा कैसे हो गया कि तब तत्कालीनी केंद्रीय गुलजारी लाल नंदा ने उन्हें मना लिया.

60 के दशक में हिन्दुस्तान टाइम्स के संपादक रहे और दिग्गज पत्रकार दुर्गादास ने अपनी किताब “फ्राम कर्जन टू नेहरू एंड आफ्टर” में इस विषय पर रोचक बात लिखी है.

उन्होंने लिखा, नेहरू मंत्रिमंडल में तब सत्यनारायण सिन्हा संसदीय मामलों के मंत्री रहे फिर सूचना-प्रसारण मंत्री बने. उन्हें ज्योतिष में बहुत विश्वास था. उन्हें एक ज्योतिष ने बताया कि नेहरू मंत्रिमंडल के ताकतवर मंत्री टीटी कृष्णमचारी को जल्द ही पद त्यागना होगा. जिस दिन ऐसा होगा, उसी दिन मौलाना आजाद गुसलखाने में गिरेंगे. चार दिन बाद उनकी मृत्यु हो जाएगी.

तब नेहरू बिगड़ पड़े थे
जब वास्तव में ऐसा हुआ यानि टीटीके ने इस्तीफा दिया और उसी दिन आजाद अपने बाथरूम में गिर गए तो संसद की लॉबी में नेहरू और सिन्हा की भेंट हुई. सिन्हा ने उन्हें पंडित की ज्योतिष गणना के बारे में बताया. नेहरू बिगड़ उठे, क्या फिजुल की बात कर रहे हो. मौलाना आजाद की डॉक्टरी जांच बंगाल के मुख्यमंत्री डॉ. बीसी राय ने खुद की. इसके बाद कहा, कोई खतरा नहीं है. 04 दिन बाद वास्तव में शिक्षा मंत्री मौलाना आजाद का निधन हो गया. नेहरू इससे हिल गए.

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नेहरू का झुकाव क्या जीवन के अंतिम दिनों में ज्योतिष की ओर होने लगा था. हालांकि उनके सहयोगी जब उन्हें पहले ज्योतिष सलाह का सुझाव देते थे तो वो बिगड़ उठते थे लेकिन बाद में कुछ ऐसी बातें हुईं कि उन्हें विश्वास होने लगा. (न्‍यूज 18 हिन्‍दी)

1962 में गंभीर रूप से बीमार पड़े
नेहरू पहली बार मार्च 1962 में गंभीर तौर पर बीमार पड़े. वह तेज बुखार में पुना से दिल्ली लौटे. उनके डॉक्टरों का ख्याल था कि चुनाव अभियान की थकान के कारण उनकी तबीयत खराब हुई लेकिन वो वास्तव में गंभीर रोग निकला. जिसके कारण उन्हें एक महीने से ज्यादा समय तक बिस्तर पर रहना पड़ा. वो कांग्रेस की उस पार्लियामेंट्री मीटिंग में भी नहीं जा पाए, जहां उन्हें फिर से नेता चुना गया.

ज्योतिषी ने तब ये बात नेहरू को बताई
जब सिन्हा ने पहली बार उन्हें ये सुझाव दिया कि उनकी जन्मपत्री ज्योतिषी को दिखानी चाहिए तो नेहरू ने बात अनसुनी कर दी. लेकिन फिर योजना मंत्री गुलजारी लाल नंदा ने उन पर जोर डालकर मना लिया. अब ज्योतिषी ने कहा, उनके एक अच्छे दोस्त उनके साथ विश्वासघात करेंगे और उसी वर्ष चीन आक्रमण करेगा. नेहरू बिफर उठे. उनका कहना था ऐसा कभी नहीं हो सकता. पंडित ने जन्मपत्री मोड़कर वापस कर दी और विदा ली.

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नेहरू के मंत्रिमंडल में उनके कई ऐसे सहयोगी थे, जिनका ज्योतिष पर अगाध विश्वास था. इन बातों का पत्रकार संपादक दुर्गादास ने अपनी किताब “फ्राम कर्जन टू नेहरू एंड आफ्टर” में विस्तार से जिक्र किया है. (फाइल फोटो)

नेहरू के प्रशंसकों ने गुप्त रूप से पूजा कराई
इसके कुछ महीने बाद चीन ने आक्रमण कर दिया. इस बार नेहरू ज्योतिषी की बात सुनने को तैयार थे. लेकिन पंडित ने जो बताया वो उन्हें खुशी देने वाला नहीं था. पंडित ने भविष्यवाणी की कि नेहरू की जीवन अवधि समाप्त हो गयी थी, उसे केवल पूजा से ही बढ़ाया जा सकता था. इसके बाद जो कुछ हुआ वह बहुत गुप्त तरीके से हुआ.
नेहरू के प्रशंसकों ने दिल्ली के कालकाजी के एक मंदिर में पूजा करानी शुरू की. हर दिन पूजा के बाद प्रधानमंत्री के स्थान पर जाकर उनके माथे पर तिलक लगा देते थे.

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क्या ज्योतिषी ने बता दिया था कि कब होगा उनका निधन
ज्योतिषी ने भविष्यवाणी की थी कि नेहरू दूसरी बार और भी गंभीर रूप से जनवरी 1964 में बीमार पड़ेंगे और 27 मई को उनका निधन हो जाएगा. किताब में दुर्गादास लिखते हैं कि सिन्हा ने कोशिश की कि नेहरू भुवनेश्वर के कांग्रेस अधिवेशन में हिस्सा नहीं लें लेकिन वह सफल नहीं हुए. नेहरू दिल्ली से 04 जनवरी को रवाना हुए. दो तीन दिन बाद ही बहुत अधिक बीमार हो गए. उस समय उन्हें जो दौरा पड़ा, उससे वह फिर उबर ही नहीं पाए.

किताब में लिखा है, 14 मई के कांग्रेस अधिवेशन में सिन्हा ने मंत्रिमंडल के कुछ सहयोगियों से कहा कि मुंबई के एक ज्योतिषी की भविष्यवाणी के अनुसार प्रधानमंत्री करीब 10 दिनों से ज्यादा जीवित नहीं रह सकेंगे. 27 मई को नेहरू का निधन हो गया.

आखिरी दिनों में ज्योतिष की ओर हो गया था झुकाव
दुर्गादास लिखते हैं कि अंतिम दिनों में नेहरू का झुकाव ज्योतिष औऱ आयुर्वेद की ओर होने लगा था. नेहरू आयुर्वेद को हमेशा अवैज्ञानिक चिकित्सा शास्त्र मानते थे लेकिन अंतिम दिनों में उन्होंने एक प्रसिद्ध वैद्य की दवा खाना स्वीकार किया था.

वैसे देश में ये सर्वविदीत है कि ज्यादातर ज्योतिषियों की सलाह पर बहुत ध्यान देते हैं. उसी के अनुसार काम करते हैं. कई नेता तो खुद काफी अच्छे ज्योतिष के जानकार रहे हैं.

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