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पटना3 घंटे पहलेलेखक: शंभू नाथ

दो साल बाद पटना यूनिवर्सिटी में छात्र संघ चुनाव हो रहा है। पूरा कैंपस चुनाव के रंग में रंगा है। कैंडिडेट वोट मांगने में व्यस्त हैं। स्टूडेंट्स चुनावी माहौल का आनंद ले रहे हैं। इस बार चुनाव मैदान में ABVP, छात्र जदयू, छात्र राजद, जन अधिकार छात्र परिषद, AISA, AISF समेत सभी विचारधारा की पार्टियां मैदान में हैं।

हर कोई अपनी-अपनी जीत का दावा कर रहा है। आंकड़े बताते हैं कि पटना यूनिवर्सिटी सियासत का एक ऐसा सेंटर है, जहां कोई भी दल या संगठन अपने एकाधिकार या वर्चस्व का दावा नहीं कर सकता है। यहां आज भी बाहुबल, धनबल और जाति का फैक्टर आइडियोलॉजी पर भारी है।

28 साल बाद 2012 से यहां छात्र संघ के नियमित चुनाव हो रहे हैं। 2012 से 2019 के बीच पटना यूनिवर्सिटी में छात्र संघ के 4 चुनाव हुए। इनमें एक बार भी अध्यक्ष पद किसी एक दल को लगातार दोबारा नहीं मिला। इतना ही नहीं सेंट्रल पैनल के 5 पदों पर भी किसी दल को बहुमत नहीं मिल पाया है। हर पद पर अलग-अलग दल के कैंडिडेट जीतते रहे हैं।

वीमेंस कॉलेज के बाहर प्रत्याशियों के पक्ष में वोट मांगते समर्थक।

वीमेंस कॉलेज के बाहर प्रत्याशियों के पक्ष में वोट मांगते समर्थक।

छात्र राजनीति से ही हावी हो जाती है जाति

पॉलिटिकल एनालिस्ट और पटना यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस की पूर्व विभागाध्यक्ष शेफाली रॉय कहती हैं कि पटना यूनिवर्सिटी में धनबल और बाहुबल के साथ जाति एक बड़ा फैक्टर है। वो कहती हैं कि अध्यक्ष जैसे अहम पदों पर भी लोग स्टूडेंट्स के कैलिबर की जगह उनकी जाति और उनकी पहुंच को देखकर वोट देते हैं। यहां विचारधारा की राजनीति नगण्य है।

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कैंपस में मूल्यविहीन राजनीति को दिया जा रहा है बढ़ावा

कैंपस की सियासत में किसी एक दल का वर्चस्व नहीं होना क्या ये सकारात्मक संदेश है या इसमें बदलाव की जरूरत है? इस सवाल पर शेफॉली रॉय कहती हैं कि ये राजनीति के लिए एक खतरनाक साइन है। वो कहती हैं कि आइडियोलॉजी और इश्यू बेस्ड पॉलिटिक्स को बढ़ावा देने की जरूरत है। मौजूदा दौर में मूल्यविहीन राजनीति की जा रही है। जबकि कैंपस की पॉलिटिक्स से निकल ही लोग प्रदेश और राष्ट्र के नेता बनते हैं। जिस परिपाटी को ये यहां से सीखेंगे उसे ही आगे बढ़ाएंगे।

आइसा के समर्थक इस अंदाज में प्रचार कर रहे हैं।

आइसा के समर्थक इस अंदाज में प्रचार कर रहे हैं।

भैया- दीदी का कल्चर हावी, पॉलिटिकल अवेयरनेस की कमी

पटना यूनिवर्सिटी की महासचिव रह चुकी जेएनयू में पीएचडी स्कॉलर अंशु कुमारी कहती हैं कि पटना यूनिवर्सिटी में भैया-दीदी का कल्चर हावी है। जान-पहचान पर वोट करते हैं। राजनीति की समझ अभी भी यहां के स्टूडेंट्स में बहुत कम है। स्टूडेंट्स के बीच विचारधारा के आदान-प्रदान का बड़ा गैप है। बिहार में जेडीयू और आरजेडी जैसे क्षेत्रीय दलों के छात्र विंग तो हैं लेकिन ये बस जाति तक ही सिमट कर रहे जाते हैं। सोशल जस्टिस को लेकर उनकी राजनीति करने का दावा करते हैं लेकिन अंबेडकर, लोहिया, फूले इनके विचार से गायब हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि स्टूडेंट्स विंग की जवाबदेही है कि वो विचारों के प्रवाह को आगे बढ़ाएं।

जाति के आधार पर हॉस्टल अलॉट होते हैं लोकतांत्रिक माहौल कैसे बनेगा

अंशु कहती हैं कि वर्गों के बीच वर्गीकरण की शुरुआत यहां एडमिशन के समय से ही शुरू हो जाता है। सबसे खतरनाक तो ये है कि यहां जाति के आधार पर हॉस्टल अलॉट किए जाते हैं, वहां लोकतांत्रिक माहौल कैसे पनपेगा। लोकतांत्रिक माहौल के लिए जरूरी है स्टूडेंट्स का एक दूसरे से मेल-मिलाप। जब तक ये एक-दूसरे को जानेंगे नहीं तब तक कैसे लोकतांत्रिक माहौल विकसित होगा। इसके कारण सीनियर-जूनियर के बीच की खाई बढ़ते चली जाती है।

स्टूडेंट्स को प्रभावित करने के लिए प्रत्याशियों की तरफ से अलग-अलग प्रलोभन दिए जा रहे हैं।

स्टूडेंट्स को प्रभावित करने के लिए प्रत्याशियों की तरफ से अलग-अलग प्रलोभन दिए जा रहे हैं।

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सियासत की जरूरत नहीं, पहचान ही काफी है

पटना यूनिवर्सिटी छात्र संघ के मौजूदा अध्यक्ष जन अधिकार छात्र परिषद के मनीष कुमार हैं। वो कहते हैं कि पटना यूनिवर्सिटी में सियासत मैटर नहीं करता है। जो भी स्टूडेंट्स से जुड़ कर काम रहे हैं बस वही मैटर करता है। वो कहते हैं कि यही कारण है कि पटना यूनिवर्सिटी में अभी तक कोई सियासी रंग नहीं चढ़ पाया है। चुनाव में अलग-अलग दलों के नेताओं के प्रचार करने आने के सवाल पर वे कहते हैं कोई भी आ जाएं यहां मैटर सिर्फ पहचान ही मैटर करता है।

पटना यूनिवर्सिटी के बाहर चुनव प्रचार करते प्रत्याशी।

पटना यूनिवर्सिटी के बाहर चुनव प्रचार करते प्रत्याशी।

सेंट्रल पैनल में एकता नहीं होने का क्या होता है नुकसान

एक स्टूडेंट्स के रूप में अगर आप केवल जान-पहचान के आधार पर वोट दे देंगे तो नुकसान ही पहुंचाएगा। वो कहते हैं कि स्टूडेंट्स को ये समझना होगा कि मुद्दों की लड़ाई कौन लड़ सकता है। जब छात्र मुश्किल में होंगे तो उनके साथ कौन खड़ा होगा। कौन प्रोटेस्ट करेगा। एक मजबूत पैनल नहीं होने का खामियाजा भी छात्रों को ही भुगतना पड़ता है। सेंट्रल पैनल में रह चुके कई पदाधिकारियों का मानना है कि 5 सदस्यों में सभी अलग-अलग होने के कारण कभी एकमत नहीं हो पाता है। सभी आपस में लड़ते रहते हैं।

अब पिछले 4 चुनाव में छात्र संघ चुनाव में विजयी सेंट्रल पैनल को जान लीजिए …

2012

पद नाम संगठन

अध्यक्ष आशीष सिन्हा ABVP

उपाध्यक्ष अंशुमान AISF

महासचिव अंशु कुमारी AISA

सचिव अनुप्रिया C. JDU

कोषाध्यक्ष अभिषेक ABVP

2018(फरवरी)

पद नाम संगठन

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अध्यक्ष दिव्यांशु भारद्वाज निर्दलीय

उपाध्यक्ष योशिता पटवर्धन ABVP

महासचिव सुधांशु भूषण ABVP

सचिव आजाद चांद JACP

कोषाध्यक्ष नीतीश कुमार ABVP

2018 (नवंबर)

पद नाम संगठन

अध्यक्ष मोहित प्रकाश- C. JDU

उपाध्यक्ष – ABVP

महासचिव मणिकांत मणी ABVP

सचिव राजा रवि ABVP

कोषाध्यक्ष कुमार सत्यम C. JDU

2019

पद नाम संगठन

अध्यक्ष मनीष कुमार JACP

उपाध्यक्ष निशांत यादव C.RJD

महासचिव प्रयंका श्रीवास्तव ABVP ‘

सचिव आमिर रजा JACP

कोषाध्यक्ष कोमल कुमार AISA

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