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दास्तान-गो : किस्से-कहानियां कहने-सुनने का कोई वक्त होता है क्या? शायद होता हो. या न भी होता हो. पर एक बात जरूर होती है. किस्से, कहानियां रुचते सबको हैं. वे वक़्ती तौर पर मौज़ूं हों तो बेहतर. न हों, बीते दौर के हों, तो भी बुराई नहीं. क्योंकि ये हमेशा हमें कुछ बताकर ही नहीं, सिखाकर भी जाते हैं. अपने दौर की यादें दिलाते हैं. गंभीर से मसलों की घुट्‌टी भी मीठी कर के, हौले से पिलाते हैं. इसीलिए ‘दास्तान-गो’ ने शुरू किया है, दिलचस्प किस्सों को आप-अपनों तक पहुंचाने का सिलसिला. कोशिश रहेगी यह सिलसिला जारी रहे. सोमवार से शुक्रवार, रोज़… 

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जनाब, हिन्दुस्तान में जब भी हरनाज़ संधू, मानुषी छिल्लर, प्रियंका चोपड़ा, ऐश्वर्या राय, सुष्मिता सेन, जैसी सुंदरियां ‘मिस-वर्ल्ड’, ‘मिस-यूनिवर्स’ या ‘मिस-अर्थ’ जैसा कोई ताज़ जीतती हैं तो बड़ी सुर्ख़ियां बनती हैं. इन सुर्ख़ियों में दो-तीन चीज़ें ख़ास तौर पर हुआ करती हैं. पहली ये कि जिनके सिर पर ताज़ रखा गया, उन्होंने इसकी तैयारी कैसे की. क्या खाया-पिया. कितनी मेहनत की. वग़ैरा, वग़ैरा. और दूसरी ये सुर्ख़ी भी साथ में चला करती है कि इन सुंदरियों की ऐसी कामायबी के लिए ज़मीन किसने तैयार की थी. यानी पहली मर्तबा किसे इस तरह की सौंदर्य प्रतियोगिता का ताज़ अपने सिर पर सजाने का मौका मिला. और इस दूसरी वाली सुर्ख़ी के साथ एक ही नाम उभरता है हमेशा, रीटा फ़ारिया का. जिन्होंने साल 1966 में आज के रोज़ यानी 17 नवंबर को लंदन में ‘मिस वर्ल्ड’ का ख़िताब अपने नाम किया था. वह भी बिना किसी तैयारी के, मज़ाक-मज़ाक में.

जी जनाब, रीटा फ़ारिया के लिए ‘मिस वर्ल्ड’ के ख़िताब तक का सफ़र महज़ मज़ाक में ही शुरू हुआ था. और चूंकि मज़ाक में यह सिलसिला चल पड़ा, लिहाज़ा पहले से किसी मुक़म्मल तैयारी का तो सवाल ही नहीं उठता. ऐसे में, बड़े दिलचस्प मोड़ से गुज़रा उनका यह सफ़र. बात उन दिनों की है, जब रीटा बंबई के ग्रांट मेडिकल कॉलेज में पढ़ाई कर रही थीं. उन्हें डॉक्टर बनना था और पूरा ध्यान, पूरी तैयारी उसी तरफ़ थी. हालांकि नैन-नक़्श आकर्षक दिए थे ऊपर वाले ने. तो वही ज़ेहन में रखते हुए एक बार किसी सहेली ने यूं ही मज़ाक-मज़ाक में कह दिया, ‘सुना तूने? बंबई में ब्यूटी कॉन्टेस्ट हो रहा है. इस बार की ‘मिस बॉम्बे’ चुनी जाएगी. तू भी क्यूं नहीं भेज देती अपनी तस्वीर?’ ‘मैं? मैं क्या करूंगी वहां जाकर? मुझे थोड़े न मॉडल-वॉडल या कोई हीरोइन-वीरोइन बनना है. नहीं, नहीं’. ‘अरे भेज न, बस एक तस्वीर तो भेजनी है, जाता क्या है तेरा?’

और मज़े की बात देखिए जनाब कि उस वक़्त रीटा के पास उनकी एक ढंग की तस्वीर भी नहीं थी, जिसे वे ‘मिस बॉम्बे’ प्रतियोगिता के आयोजकों के पास भेज सकें. उन्होंने ही ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ अख़बार को एक बार बताया था, ‘सहेली ने कहा तो मैंने भी सोचा कि क्यूं न तजरबा कर के देख लिया जाए. लेकिन मेरे पास मेरी कोई अच्छी तस्वीर नहीं थी. तब मेरी बड़ी बहन फिलोमिना मुझे एक स्टूडियो लेकर गईं. वहां मेरी कुछ तस्वीरें ली गईं. उन्हें मैंने आयोजकों को भेज दिया. इत्तिफ़ाक़ से मुझे बुला लिया गया, उस प्रतियोगिता के लिए. और यूं ही करते-करते मैं ‘मिस बॉम्बे’ बन गई. ये साल 1966 की ही बात है. उस दौर में ईव वीकली मैगज़ीन होती थी. वही ये प्रतियोगिता आयोजित किया करती थी. इसके बाद उन्हीं लोगों ने ‘मिस इंडिया’ प्रतियोगिता आयोजित की. उसमें भी मैं जीत गई. इसके एवज़ में पहले मुझे 5,000 और फिर 10,000 रुपए मिले’.

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Reita Faria

‘इनाम में जीती पूरी रकम मैंने मां को दे दी. ताकि वे जो अनाथालय चलाती थीं, वहां ये पैसा बच्चों के कुछ काम आ जाए. पर इधर मेरे सामने नई मुश्किल आन पड़ी. अब ‘मिस इंडिया’ बन जाने के बाद मुझे लंदन जाने को कहा गया. ताकि वहां होने वाली ‘मिस वर्ल्ड’ प्रतियोगिता में हिन्दुस्तान की नुमाइंदगी करूं. अब तक उस प्रतियोगिता में मुझसे पहले हिन्दुस्तान से सिर्फ़ फ्लर एज़िकेल को ही जाने का मौका मिला था. साल 1959 में. लेकिन मेरे सामने दिक़्क़त ये थी कि वहां जाने के लिए मेरी अलमारी में ढंग के कपड़े तक नहीं थे. यहां तक कि देश से बाहर जाने के लिए पासपोर्ट भी नहीं था. ऐसे में इस तरह की प्रतियोगिता के लिए कोई फॉर्मल ट्रेनिंग वग़ैरा ले लेने का तो सवाल ही कहां था. उस वक़्त मेरी मां ने ज़ल्दी-ज़ल्दी में कुछ कपड़ों का बंदोबस्त किया. मैंने एक परिचित से साड़ी मांगी और एक्ट्रेस पर्सिस खंबाटा से उनका बाथिंग-सूट लिया’.

‘आयोजकों को पता चला कि मेरे पास पासपोर्ट नहीं है तो तुरत-फ़ुरत उन्होंने इसका इंतज़ाम कराया. इस तरह जोड़-तोड़ भिड़ाकर मैं किसी तरह लंदन पहुंची. यहां सूटकेस में मेरे, इसी तरह जुटाए गए कुछ कपड़े थे. छोटी सी मेक-अप किट और पैसों के नाम पर कुल तीन पाउंड, जो शुरुआत में ही ख़र्च करने पड़ गए. दरअस्ल, हुआ यूं कि जब मैं वहां पहुंची और एक अहम मौके पर मैंने पर्सिस का बाथिंग-सूट पहना तो वह मेरे लिए छोटा पड़ गया. क्योंकि पर्सिस ऊंचाई में मुझसे थोड़ी कम पड़ती थी. इसी तरह की दिक़्क़त हील वाली चप्पलों को लेकर थी. आयोजकों ने इस तरफ़ ध्यान दिलाया तो मुझे फिर नया बाथिंग सूट और जूते-चप्पल वग़ैरा ख़रीदने पड़ गए. ख़ैर, जैसे-तैसे बंदोबस्त किया. लेकिन फिर भी वहां मैं ख़ुद को बाहरी जैसा महसूस कर रही थी. क्योंकि बाकी लड़कियों के पास अच्छे कपड़े, जूते वग़ैरा तो थे ही, वे प्रशिक्षित भी थीं पूरी तरह’.

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‘रही मेरी बात, तो मुझे ये भी नहीं पता था कि रैंप पर क्या पहनना चाहिए और क्या नहीं. फिर भी, किसी तरह सिलसिला आगे बढ़ता रहा. लंदन में वेलिंग्टन स्ट्रीट के लिसियम बॉलरूम में ‘मिस वर्ल्ड’ प्रतियोगिता हो रही थी. कुल 66 लड़कियां थीं उसमें. सट्‌टेबाज़ कुछेक लड़कियों की जीत पर शर्तिया दांव लगा रहे थे. और मुझे पता चला कि मेरी जीत पर सिर्फ़ एक आदमी ने दांव खेला है. वह एक हिन्दुस्तानी था. शायद हिन्दुस्तानियत की रौ में बहकर उसने मुझ पर दांव लगाया होगा. पर जैसे-जैसे प्रतियोगिता आगे बढ़ी मेरा भरोसा भी बढ़ता गया. मेरी उम्र उस वक़्त 23 साल ही थी लेकिन मुझे ये एहसास था कि मैं कुछ बड़ा करने जा रही हूं. इसी एहसास और भरोसे के साथ जब स्विम-सूट पहनकर मैं रैंप पर चली तो शायद तब पहली हिन्दुस्तानी थी, जिसने ऐसा किया. उस प्रतियोगिता के दौरान मेडिकल बैकग्राउंड भी मेरे लिए मददग़ार साबित हुआ’.

Reita Faria

‘ख़ास तौर पर आख़िरी दौर में, जब जीत-हार का फ़ैसला करने वाले जज तरह-तरह के सवाल किया करते हैं, तब मेरा मेडिकल बैकग्राउंड ही था, जिसने मुझे बाकी सभी से अलग लाकर खड़ा किया. उन्होंने मुझसे पूछा…आप आगे क्या बनना चाहती हैं? तो मैंने कहा- डॉक्टर. मैं महिलाओं की डॉक्टर बनना चाहती हूं. हिन्दुस्तान में महिलाएं सुरक्षित मातृत्त्व धारण कर सकें, इसके लिए अच्छे डॉक्टरों की सख़्त ज़रूरत है, इसीलिए. इस पर जजों ने मज़ाक़िया लहज़े में फिर सवाल किया- हिन्दुस्तान में वैसे ही काफ़ी बच्चे पैदा होते हैं? तब मैंने तुरंत उनके इस कमेंट काे संभाला- हमारे यहां पैदा हो रहे बच्चों की तादाद नियंत्रित करने के लिए भी अच्छे डॉक्टरों की ज़रूरत है… मेरे इस ज़वाब ने सभी को निरुत्तर कर दिया.’ इस सवाल-ज़वाब के बाद जनाब, जो हुआ वह तारीख़ में दर्ज़ है. रीटा ने ‘मिस वर्ल्ड’ यानी कि ‘विश्व सुंदरी’ का ख़िताब अपने नाम कर लिया था.

उस वक़्त ‘मिस वर्ल्ड’ का ख़िताब जीतने वालीं रीटा पहली हिन्दुस्तानी ही नहीं, पहली एशियाई भी थीं. यानी उन्होंने सिर्फ़ हिन्दुस्तान की ही नहीं, पूरे एशिया महाद्वीप की लड़कियों के लिए ऐसी साैंदर्य-प्रतियोगिताओं तक पहुंचने, जीतने और फिर इसी तरह के क्षेत्रों में करियर बनाने की ज़मीन तैयार कर के दे दी थी. मगर दिलचस्प ये कि उन्होंने ख़ुद जिस तरह मज़ाक-मज़ाक में उस ज़मीन पर क़दम रखा, वहां परचम फ़हराया, वैसे ही हंसते-मुस्कुराते उसे छोड़ भी दिया. हमेशा के लिए. इस बाबत भी ख़ुद रीटा से जानते हैं, ‘एक वक़्त जब मैं डॉक्टरी की पढ़ाई कर रही थी तो मुझे कोई नहीं जानता था. मगर अगले ही पल जब मैं ‘मिस वर्ल्ड’ बनी तो पूरी दुनिया मुझे जानने लगी. मेरे बारे में जानने की कोशिश करने लगी. इससे मुझे एहसास हुआ कि ये चमक-दमक, ये नाम-शोहरत, कितनी झूठी और वक़्ती (अस्थायी) है. ये सब मुझे नहीं चाहिए था. सो, छोड़ दिया’.

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हालांकि, एक साल तक रीटा अपने मन-माफ़िक डॉक्टरी के पेशे में लौट नहीं पाईं. क्योंकि वे ‘मिस वर्ल्ड’ के तौर पर क़रार से बंधी थीं. इस नाते उन्हें पूरी दुनिया में मुख़्तलिफ़ जगहों पर जाना पड़ रहा था. वहां उन मक़सदों को प्रमोट करना होता था, जो उन्हें बताए जाते. इसी सिलसिले में एक बार उन्हें वियतनाम जाना पड़ा. वहां लड़ रहे अमेरिकी सैनिकों का मनोबल बढ़ाने के लिए. इससे बताते हैं कि हिन्दुस्तान की, तब की, सरकार कुछ ख़फ़ा हो गई थी. लेकिन इससे रीटा को कोई ख़ास परेशानी नहीं हुई. बात आई और निकल गई. और फिर एक वक़्त वह आया, जब ‘मिस वर्ल्ड’ के तौर पर हुए क़रार से रीटा भी निकल गईं. तय वक़्त पूरा हो जाने के बाद. यहां से उनके सामने दो रास्ते थे. एक- वे मॉडलिंग, फिल्म वग़ैरा की चमक-दमक से भरी दुनिया में आगे बढ़तीं. और जैसा कि उन्होंने ही कहा- ‘झूठी शान-आन’ और ‘वक़्ती दौलत-शोहरत’ कमा लेतीं. जो कि अधिकांश लड़कियां करती भी हैं. या फिर दूसरा- ज़िंदगी में कुछ सच्चा सुकून जुटा लेतीं अपने लिए’.

जनाब, रीटा ने दूसरा रास्ता चुना. सच्चा सुकून जुटाने का. उन्होंने ‘मिस वर्ल्ड’ के तौर पर जो रकम जीती, उसकी मदद से लंदन के किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज़ में दाख़िला लिया. यहां उन्होंने फिर एक तारीख़ी मिसाल क़ायम की. क्योंकि वे पहली ‘मिस वर्ल्ड’ थीं, और शायद आज भी हैं, जिन्होंने डॉक्टरी को बतौर पेशा अपनाया था. डॉक्टरी की पढ़ाई पूरी होते-होते रीटा को वहीं, मेडिकल कॉलेज में ही, अपने हमसफ़र मिल गए. डॉक्टर डेविड पॉवेल, जिनसे उन्होंने शादी कर ली. साल 1971 में. इसके बाद आज डॉक्टर पॉवेल और रीटा अपने भरे-पूरे परिवार के साथ आयरलैंड के डबलिन शहर में रहते हैं. लोगों की मदद करते हैं. उनके मर्ज़ का इलाज़ करते हैं. और मरीज़ों की परिवारवालों की तरह देखभाल करते हैं. वैसे, परिवार की बात आई है तो बता दें कि रीटा की दो बेटियां हैं- डायर्ड्री और एन मैरी. और पांच नाती-नातिन हैं. ख़ुशहाल.

बस, आज के लिए इतना ही. ख़ुदा हाफ़िज़.

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