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दास्तान-गो : किस्से-कहानियां कहने-सुनने का कोई वक्त होता है क्या? शायद होता हो. या न भी होता हो. पर एक बात जरूर होती है. किस्से, कहानियां रुचते सबको हैं. वे वक्ती तौर पर मौजूं हों तो बेहतर. न हों, बीते दौर के हों तो भी बुराई नहीं. क्योंकि ये हमेशा हमें कुछ बताकर ही नहीं, सिखाकर भी जाते हैं. अपने दौर की यादें दिलाते हैं. गंभीर से मसलों की घुट्‌टी भी मीठी कर के, हौले से पिलाते हैं. इसीलिए ‘दास्तान-गो’ ने शुरू किया है, दिलचस्प किस्सों को आप-अपनों तक पहुंचाने का सिलसिला. कोशिश रहेगी यह सिलसिला जारी रहे. सोमवार से शुक्रवार, रोज…

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यूं कि जनाब, अस्ल (वास्तविकता) तो पुख़्ता तौर पर किसी को भी पता नहीं. लिहाज़ा, एक फ़र्ज़-ए-मुहाल (काल्पनिक सोच) है. बेहद दिलचस्प और जो अब तक कही-सुनी दास्तां को दूसरा मोड़ देती है. शाहजहां-मुमताज़ की मोहब्बत की दास्तां के साथ अदावत (बैर) का भरम रखती है. तो देखिए, सामने एक स्टेज खुला हुआ है. आहिस्ता-आहिस्ता पर्दा उठ रहा है और क़िस्सा मंज़र-ए-आम पर लाया जा रहा है. एक अदाकार ने शहंशाह-ए-हिन्दुस्तान शाहजहां का भेष धरा हुआ है. दूसरी एक ख़वातीन हैं, जो मुमताज़ महल के किरदार में नज़र आती हैं. दोनों के बीच शतरंज की बिसात बिछी हुई है, जिस पर वे अपनी बारी आते ही सोच-समझकर इत्मीनान से मोहरे आगे बढ़ा रहे हैं.

शहंशाह के साथ इस वक़्त सिर्फ़ उनकी महबूब शरीक-ए-हयात (पत्नी मुमताज़) ही नहीं हैं. उन्हें एक ख़ास क़िस्म के शरबत का संग भी मिला हुआ है. दोनों का मिला-जुला नशा उन पर तारी है. और उनके बीच हंसी-मज़ाक जारी है. दावे करते जाते हैं दोनों कि ये बाजी तो वे ही जीतने वाले हैं. शर्तें लग रही हैं कि तभी मुमताज़ मज़ाक से हटकर शाहजहां के सामने कुछ संजीदा हो जाती हैं, ‘अच्छा बादशाह सलामत, ऐसी बात है तो यही सही. मगर ये बताइए कि जीत अगर मेरी हुई तो आप मुझे क्या देंगे?’, ‘बाक़ी क्या रहा है हमारे पास अब मल्लिका-ए-हिन्दुस्तान? सब कुछ तो आपके हवाले कर चुके हैं हम,’ बादशाह हमेशा की तरह इश्क़िया अंदाज़ में कह उठे.

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‘है, बादशाह सलामत. एक चीज़ है. हमारा अब भी कोई हक़ नहीं उस पर.’ ‘अच्छा! ऐसा क्या है भला? बताइए तो. ज़रा हम भी जानें?’ ‘तख़्त-ए-हिन्दुस्तान हुज़ूर, तख़्त-ए-हिन्दुस्तान. आपकी दिल-अज़ीज़ और मल्लिका-ए-हिन्दुस्तान होने के बावज़ूद उस पर हमारा कोई हक़ नहीं है अब तक.’ सुनकर सन्न रह जाते हैं शाहजहां. माहौल में अजीब सी ख़ामोशी छा जाती है कुछ देर. बादशाह को यूं ख़ामोश देख मल्लिका फिर कुरेदती हैं उन्हें, ‘क्या हुआ हुज़ूर? तख़्त हारने से डर लग रहा है या अपनी जीत का भरोसा नहीं है बादशाह-ए-हिन्दुस्तान को?’ शहंशाह की अना (इगो) पर चोट की थी इस सवाल ने. और किसके सामने? उनकी अपनी मोहब्बत, जिन पर वे जान छिड़कते थे.

mumtaz death anniversary

शाहजहां की बेगम मुमताज की आज पुण्यतिथि है.

सो, अक्स-ए-अना (अहंकार की परछाई) में बोल पड़े, ‘दिया मल्लिका-ए-हुस्न, दिया. हार दिया आप पर ये तख़्त-ओ-ताज. ये बाजी अगर आप जीतीं तो आज से हिन्दुस्तान का ताज आपके सिर. वादा रहा हमारा.’ और चंद लम्हों के बाद ही बादशाह हार जाते हैं. शतरंज की बाजी, हिन्दुस्तान का तख़्त, अपने सिर का ताज. शाहजहां के वादे के मुताबिक अगले मंज़र ये ताज मुमताज महल के सिर पर नज़र आता है. और मुमताज़ एक संग-दिल (कठोर), बे-लगाम मल्लिका. आहिस्ता से वक़्त बीत रहा है. मल्लिका-ए-हिन्दुस्तान की बेलगामी अब अक्सर बादशाह के पेशानी पर बल डालने लगी है. इससे बादशाह की मोहब्बत भी अदावत की सी शक्ल लेने लगती है.

स्टेज पर अगले मंज़र पर्दा खुलता है तो बादशाह के लश्कर (फ़ौज) ने दक्खन के इलाके बुरहानपुर में डेरा डाला हुआ है. मुमताज़ महल संग हैं. हमल (गर्भावस्था) के आख़िरी दिनों में हैं. वे 14वीं औलाद की वालिदा बन रही हैं. ये औलाद पैदाइश पाती है और मां फ़ना हो जाती है. ये तख़्त, ताज, शहंशाह, शहंशाही, सब छोडकर दुनिया से रुख़्सत हो जाती है. तारीख़ 17 जून की. साल 1631 का. महज़ 38 बरस की उम्र हुई तब मल्लिका मुमताज़ की. उनकी रुख़्सती की ख़बर सुनकर बादशाह बेज़ार हो जाते हैं. ख़ुद को उनकी मौत की वजह मानते हैं. हालांकि मुमताज़ की मौत की वजह शाहजहां हुए, कोई और या हालात, इस पर न स्टेज कुछ कहता है न तारीख़ मुंह खोलती है.

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इक़रार-ए-गुनाह में बादशाह ज़ार-ज़ार हुए जाते हैं. रोए जा रहे हैं. अहसासों का सफ़र मोहब्बत से शुरू होकर अदावत से होते हुए अफ़सोस पर आ टिका है अब. उससे पार पाने के लिए वे फ़ैसला करते हैं कि उनकी मुमताज़ तारीख़ में गुम नहीं होगी. बल्कि वह नज़ीर बनेगी जिसे हिन्दुस्तान की सरहदों से बाहर भी सदियों तक याद किया जाएगा. और यहीं से वे ताज तामीर करने का मंसूबा बांध लेते हैं. अपनी मल्लिका की क़ब्र पर एक आलीशान मक़बरा. ऐसा जो दुनिया का अजूबा बन जाने वाला है… पर्दा गिर जाता है फिर. लोग अंदाज़े लगाते हुए रवाना हो जाते हैं. लेकिन सवाल पीछे छूट रहता है- शाहजहां को मुमताज़ से सिर्फ़ मोहब्बत थी या थोड़ी अदावत भी रही?

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ये ड्रामा है जनाब. दिल्ली के ‘पीएरोट्स ट्रुप’ के डायरेक्टर एम सईद आलम ने कुछ साल पहले इसे लोगों के सामने पेश किया था. तब बताया था उन्होंने, ‘मुमताज़ की शख़्सियत के दूसरे पहलू भी हैं. ये कि वह बहुत ख़ूबसूरत और फ़रमा-बरदार नहीं थीं. बल्कि बुलंद-नज़र (महत्वाकांक्षी) थीं और कुछ संग-दिल भी. शतरंज की तो वह शाहजहां से भी बेहतरीन खिलाड़ी थीं. इन पहलुओं को लोग ज़्यादा नहीं जानते. ये ड्रामा उन्हीं से लोगों को वाबस्ता कराने के लिए लिखा, खेला गया है.’ उसी दौरान दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर फरहत हसन ने पुख़्तगी की थी, ‘मुमताज़ के पास ख़ासी राजनीतिक ताक़त थी. तारीख़ी दस्तावेज़ पुख़्ता करते हैं कि शाही मामलात और और हुक्म-फ़रमानों में उनका दख़ल काफ़ी हुआ करता था. बादशाह को इससे परेशानी होने लगी थी.’

बताते हैं, हिन्दुस्तान में ये ड्रामा ‘शाहजहां-ओ-मुमताज़’ के नाम से खेला गया. अलबत्ता, शुरुआती तौर पर लंदन के मुसन्निफ़ (लेखक) दिलीप हीरो ने इसे लिखा. अंग्रेजी ज़बान में, 1970 के सालों में. उन्होंने नाम दिया इसे, ‘द टेल ऑफ़ ताज’ यानी ताज की कहानी. हालांकि ये क़िस्सा ताज से ज़्यादा मुमताज़ का हुआ. इसीलिए आज मुमताज़ की बरसी के दिन यहां काबिल-ए-ज़िक्र रहा.

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* दास्तान-गो : मुमताज से अगर शाहजहां की अदावत हुई भी तो बे-वज़ा न थी

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