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दास्तान-गो : किस्से-कहानियां कहने-सुनने का कोई वक्त होता है क्या? शायद होता हो. या न भी होता हो. पर एक बात जरूर होती है. किस्से, कहानियां रुचते सबको हैं. वे वक़्ती तौर पर मौज़ूं हों तो बेहतर. न हों, बीते दौर के हों, तो भी बुराई नहीं. क्योंकि ये हमेशा हमें कुछ बताकर ही नहीं, सिखाकर भी जाते हैं. अपने दौर की यादें दिलाते हैं. गंभीर से मसलों की घुट्‌टी भी मीठी कर के, हौले से पिलाते हैं. इसीलिए ‘दास्तान-गो’ ने शुरू किया है, दिलचस्प किस्सों को आप-अपनों तक पहुंचाने का सिलसिला. कोशिश रहेगी यह सिलसिला जारी रहे. सोमवार से शुक्रवार, रोज़… 

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जनाब, हिन्दुस्तान की सितारा टेनिस खिलाड़ी सानिया मिर्ज़ा ने एक बार कभी अपने खेल के सिलसिले के बाबत कहा था, ‘ऐसा अक़्सर हुआ है कि जब भी मैं करियर के सबसे अच्छे मक़ाम पर पहुंची, मैंने ख़ुद को चोटिल कर लिया. इस वज़ह से मुझे हमेशा ही, फिर उस जगह को हासिल करने के लिए मशक़्क़त करनी पड़ी. हालांकि ऊपर वाले का शुक्र है कि इसमें एक हद तक, मैं कामयाब भी रही’. जी, सच ही है. क्याेंकि हिन्दुस्तानी खिलाड़ी होने के नाते सानिया मिर्ज़ा ने टेनिस की दुनिया में जो मक़ाम पाया, वह आज भी कई लोगों की सोच से बाहर है. वे डबल्स में दुनिया की नंबर-एक खिलाड़ी रही हैं, साल 2015-16 के दौरान. जबकि सिंगल्स में भी 2007 में दुनिया की 27वें नंबर की खिलाड़ी रही हैं. उन्होंने तीन-तीन बार (कुल छह) महिला और मिक्स डबल्स के ग्रैंड-स्लैम ख़िताब जीते हैं, जिन्हें टेनिस की दुनिया में सबसे बड़े ख़िताबों का दर्ज़ा मिला है.

हिन्दुस्तान में आज भी हजारों की तादाद में ऐसे खिलाड़ी मिलते हैं, जिन्होंने सानिया मिर्ज़ा की ऐसी शानदार कामयाबियों को देखकर ही अपने हाथ में टेनिस का रैकेट थामा है. इस खेल में कुछ कर गुज़रने का मंसूबा बांधा. तो ऐसी कामयाबी को ‘एक हद तक’ कहा जाए, ये ठीक नहीं लगता. अलबत्ता, ये एक-दम सही ही लगता है कि सानिया मिर्ज़ा ने चाेटें ख़ूब खाईं और उनसे उबरना भी उन्हें बख़ूबी आता है. और सानिया ये बात भले सिर्फ़ खेल के लिए कहती रही हों, मगर यह उनकी ज़िंदगी के दूसरे पहलुओं से जुड़ा भी एक सच है, ऐसा यक़ीनी तौर पर महसूस होता है. उन्हीं की ज़िंदगी से कुछ मिसालें देखिए. उन्होंने महज़ पांच-छह बरस की उम्र में टेनिस का रैकेट थामा. लेकिन आहिस्ता-आहिस्ता उन्हें इसी खेल में अपनी ज़िंदगी का मक़सद नज़र आने लगा. और शुरुआती मक़सद क्या? एक दिन विंबलडन में खेलना है. ‘विंबलडन’, टेनिस का मक्का.

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बड़ी बात थी. और उम्र उस वक़्त इतने बड़े ख़्वाब के लिए बहुत छोटी. लोग हंसे उन पर. ताने दिए, ‘ये क्या बात कर दी तुमने. तुम हैदराबाद से हो. बढ़िया बिरयानी बनाओ. खाओ, खेलो और मस्त रहो…’ ये शायद जिंदगी की पहली गहरी चोट थी सानिया पर. उनके मक़सद, उनके जज़्बे, उनके इरादे पर. तक़लीफ़ तो बहुत हुई होगी, यक़ीनन. पर उसे जज़्ब कर लिया उन्होंने. दर्द को लिए ही चुप-चाप अपना काम करती रहीं. और एक रोज़ वह मौका आया, जब वे विंबलडन की लाल माटी पर खेल रही थीं. साल था 2005 का, जब वे पहली बार इस टूर्नामेंट में उतरीं. फिर 2007, 2008 और 2009 में भी वे सिंगल्स में इस टूर्नामेंट में खेलीं, पर इसी ज़मीन बड़ी कामयाबी उनके ख़ाते में आई साल 2015 में. इस साल उन्होंने स्विट्ज़रलैंड की मार्टिना हिंगिस के साथ महिला डबल्स का विंबलडन ख़िताब जीतकर ‘तानों से मिली चोट पर’ ख़ुद मरहम लगाई थी.

Sania Mirza

इसी तरह, खेल से इतर ज़िंदगी की दूसरी बड़ी चोट सानिया को तब लगी जब वे महज़ 18 बरस की थीं. ये बात सितंबर 2005 की है. मसला मैच के दौरान पहने जाने वाले छोटे कपड़ों से जुड़ा था. इसे लेकर कुछ कट्‌टर मज़हबी सोच वाले लोगों को ए’तिराज़ हुआ था. ख़बरनवीसों ने दावा किया था उस वक़्त कि इन लोगों ने सानिया के ख़िलाफ़ फ़तवा जारी कर दिया है. इससे रातों-रात सानिया पूरे मुल्क में सुर्ख़ियों में थीं. ख़ुद इनकी नींद हराम हुई जाती थी. अपने हयात-नामे (जीवनी) ‘ऐस अगेंस्ट ऑड्स’ में वे उस वाक़ि’अे का ज़िक्र करती हैं. ‘वह 8 सितंबर 2005 का दिन मेरी यादों में हमेशा रहेगा. मैं  15 सितंबर 2005 को जब मां के साथ कोलकाता के दमदम एयरपोर्ट पहुंची तो हैरान रह गई. मेरे चारों ओर भारी तादाद में सुरक्षाबल तैनात थे’.

‘कोलकाता में मेरा टूर्नामेंट था. और उससे दो दिन पहले मेरी सुरक्षा के लिए कई हथियारबंद पुलिसवाले लगाए गए थे. वे 24 घंटे मेरी सुरक्षा में रहते थे. मुझे स्टेडियम भी लड़ाई का मैदान लगने लगा था, जहां कई पुलिसवाले मेरी सुरक्षा कर रहे थे. इससे मुझे डर लगने लगा. मैंने फोन कर अपने अब्बू को कोलकाता बुला लिया. वे भी काफ़ी परेशान हो गए और जल्द ही मेरे पास पहुंच गए. टूर्नामेंट सही समय पर शुरू हुआ. पर दबाव इतना ज़्यादा था कि मैं दूसरे राउंड में पहला सेट जीतने के बाद भी आगे नहीं बढ़ सकी. टूर्नामेंट से बाहर होना पड़ा मुझे’. यक़ीनी तौर पर बड़ी तक़लीफ़-देह रही होगी ये चोट भी. लेकिन जैसा कि पहले ही कहा न, सानिया मिर्ज़ा ‘चोट खाकर उबरना’ बख़ूबी जानती हैं. इससे भी उबर आईं वे. साल 2005 में ही यूएस ओपन के चौथे दौर तक पहुंचकर उन्होंने बता दिया कि इन चोटों का उन पर ख़ास असर होने वाला नहीं है.

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फिर अगले साल, 2006 में वे पहली हिन्दुस्तानी महिला खिलाड़ी बनीं, जिन्हें ऑस्ट्रेलियन ओपन में वरीयता दी गई. और इसके महज़ तीन साल बाद यानी 2009 में तो यही ऑस्ट्रेलियन ओपन का ख़िताब उनके ख़ाते में दर्ज़ हुआ. सानिया ने मिक्स डबल्स में हिन्दुस्तान के ही एक और सितारा खिलाड़ी महेश भूपति के साथ यह ख़िताब जीता था. दोनों की जोड़ी आहिस्ता-आहिस्ता कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ रही थी. दोनों ने 2012 में फ्रेंच ओपन का ख़िताब भी अपने नाम कर लिया था. मगर तभी सानिया को फिर बड़ी चोट लगी. मसला, साल 2012 में ही, ओलंपिक के लिए चुने जाने का पेश आया. उसमें किसको, किसके साथ खेलना है, यह फ़ैसला टेनिस संघ किया करता है. सानिया को यक़ीन था कि महेश भूपति संग उनकी जोड़ी की कामयाबी को देखते हुए उन्हें ओलंपिक में उन्हीं के साथ खिलाया जाएगा. और वे देश के लिए पदक जीतने में सफल हो सकेंगी.

Sania Mirza

लेकिन सानिया का भरोसा टूट गया. या कहें कि तोड़ दिया गया. रुतबे की लड़ाई में, जैसा सानिया ने ख़ुद कहा, उन्हें ‘बलि का बकरा बना दिया गया’. उस ओलंपिक में सानिया उतरीं, पर भूपति के बजाय लिएंडर पेस के साथ, जो तब हिन्दुस्तान के अव्वल टेनिस खिलाड़ी हुआ करते थे. हालांकि इसके बाद भी सानिया-पेस की जोड़ी ‘लंदन ओलंपिक’ में कुछ ख़ास असर दिखा नहीं पाई. और इधर इस पूरे कड़वे वाक़ि’अे ने सानिया-भूपति की पेशेवर जोड़ी के बीच भी दरार डाल दी. ये जोड़ी टूट गई. पर सानिया नहीं टूटीं. उन्होंने फिर वापसी की. नई जोड़ी बनाई और 2014 में यूएस ओपन का ख़िताब अपने नाम कर लिया. इसके बाद साल 2015-16 में तो उन्होंने मार्टिना हिंगिस के साथ मिलकर एक के बाद एक तीन ग्रैंड-स्लैम अपने नाम किए. विंबलडन, जिसकी पहले बात हो चुकी है. फिर यूएस ओपन (2015) और ऑस्ट्रेलियन ओपन (2016) भी.

यही वह दौर था, जब सानिया मिर्ज़ा डबल्स में दुनिया की नंबर-एक टेनिस खिलाड़ी बन चुकी थीं. हालांकि, इस दौर से थोड़ा पहले ही, उन्हें ज़ाती ज़िंदगी में भी एक बड़ी चोट का सामना करना पड़ा. साल 2010 की बात है ये. पाकिस्तान के क्रिकेट खिलाड़ी शोएब मलिक पर सानिया का दिल आ गया था. लिहाज़ा, दोनों ने शादी कर ली. लेकिन यह बात हिन्दुस्तान के एक बड़े तबके को नागवार गुज़री. हिन्दुस्तान के लिए सानिया के जज़्बे पर सवाल उठाए गए. यहां तक कह दिया गया कि उन्होंने ‘मुल्क के साथ ग़द्दारी’ की है. और अब वे दुनिया में ‘पाकिस्तान का परचम’ बलंद करेंगी. लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं. सानिया ने इन तमाम तानों, उलाहनों पर कान न देते हुए एक तरफ़ ताे शोएब मलिक के साथ अपनी ज़ाती ज़िंदगी को संभाला. दूसरी तरफ़, पेशेवर टेनिस की दुनिया में सिर्फ़ और सिर्फ़ हिन्दुस्तान का तिरंगा लहराया. पाकिस्तान की बहू होने के बावजूद.

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हालांकि, अब एक बार फिर सानिया चोट का सामना कर रही हैं. ज़ाती ज़िंदगी के अहम मोड़ पर खड़ी बताई जाती हैं. पाकिस्तान में ऐसी सुर्ख़ियां हैं कि शोएब मलिक ने सानिया मिर्ज़ा को शादी में धोखा दिया है. एक मोहतरमा हैं आयशा उमर. मॉडलिंग करती हैं. उनकी हाल ही में शोएब मलिक के साथ कुछ तस्वीरें दुनिया के सामने आई हैं. कहा जा रहा है कि ये तस्वीरें सिर्फ़ पेशेवर हैसियत नहीं रखतीं हैं. इन तस्वीरों का मसला काफ़ी-कुछ ज़ाती-सा भी है, इसीलिए सानिया काफ़ी ख़फ़ा हैं. उन्होंने शोएब मलिक से दूरी बना ली है. वे शायद शोएब से तलाक़ लेने का भी फ़ैसला कर चुकी हैं. अलबत्ता इसी बीच, दूसरी ख़बरें यह भी बता रही हैं कि सानिया और शोएब मिलकर कोई टीवी शो शुरू करने वाले हैं. उसी को सुर्ख़ियों में लाने के लिए तलाक़ के इस मसले को हवा दी गई है. अब इनमें से सच बात कौन सी है, यह तो वही दोनों बता सकते हैं. मगर…

मगर एक बात कोई भी बता सकता है जनाब, कि चोट चाहे ज़ाती हो या पेशेवर. सानिया को उससे उबरना बख़ूबी आता है. सो, वह इस मसले से भी ज़ल्द उबर ही आएंगी. और आज, 15 नवंबर को उनके जन्मदिन पर चाहने वाले भी उनके लिए दुआ करते ही होंगे कि वह ज़ल्द अपनी क़ामयाब-रौ में नज़र आएं. आमीन!

आज के लिए बस इतना ही. ख़ुदा हाफ़िज़.

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