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हेल्सिंकी. रूस और यूक्रेन के बीच 24 फरवरी से जंग (Russia-Ukraine War) जारी है. इस जंग में जहां यूक्रेन बर्बाद हो रहा है, वहीं रूस भी दुनिया में अलग-थलग पड़ गया है. कभी सोवियत संघ के सहयोगी रहे देश अब अमेरिका के सहयोगी NATO में शामिल होना चाहते हैं. फिनलैंड और स्वीडन ने NATO की सदस्यता के लिए आवेदन कर रहे हैं. फिनलैंड (Finland) के राष्ट्रपति सौली निनिस्टो और प्रधानमंत्री सना मारिन ने “बिना देरी किए” सैन्य गठबंधन NATO की सदस्यता के लिए आवेदन करने की घोषणा की है. स्वीडन भी कुछ दिनों के भीतर NATO सदस्यता के लिए आवेदन कर सकता है. दोनों देशों का यह फैसला खास इसलिए है, क्योंकि दोनों ही देश मौजूदा यूक्रेन जंग में तटस्थता (न्यूट्रलिटी) के लिए जाने जाते रहे हैं.

आइए जानते हैं कि फिनलैंड और स्वीडन आखिर NATO में क्यों शामिल होना चाहते हैं? इससे रूस को क्या खतरा है और यूरोप पर इसका क्या असर होगा?

  • फिनलैंड और स्वीडन NATO में शामिल क्यों होना चाहते हैं?

    NATO – उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (North Atlantic Treaty Organisation) – दूसरे विश्व युद्ध के खत्म होने के तुरंत बाद स्थापित 30-देशों का रक्षात्मक सैन्य गठबंधन है. वैसे तो इसका मुख्यालय Brussels में है लेकिन इसपर अमेरिका समेत अन्य परमाणु हथियार संपन्न अन्य पश्चिमी देशों का प्रभुत्व है. 1991 में सोवियत यूनियन के विघटन के बाद NATO का पूर्व में रूस के पड़ोस में तेजी से विस्तार हुआ और इसे रूस ने हमेशा शक की निगाह से देखा. अब तक यह रूस की दुश्मनी से बचने के लिए NATO से बाहर रहा है. अब इसी विस्तार में फिनलैंड और स्वीडन शामिल होना चाहते हैं.

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  • रूस और फिनलैंड के कैसे हैं रिश्ते?

    फिनलैंड रूस के साथ 1340 किलोमीटर का बॉर्डर शेयर करता है. फिनलैंड और रूस (तब का सोवियत संघ) दूसरे विश्व युद्ध में विरोधी पक्ष में थे. यूक्रेन पर हमला कर व्लादिमीर पुतिन ने उत्तरी यूरोप में लंबे समय से चली आ रही स्थिरता की भावना को चकनाचूर कर दिया है, जिससे स्वीडन और फिनलैंड असुरक्षित महसूस कर रहे हैं.

    NATO को लेकर फिनलैंड के लोगों की क्या है राय?

    NATO में शामिल होने के लिए फिनलैंड की जनता का समर्थन सालों से केवल 20-25% था. लेकिन लेटेस्ट जनमत सर्वेक्षण के अनुसार यूक्रेन पर रूस के आक्रमण के बाद से NATO के लिए फिनलैंड की जनता का समर्थन रिकॉर्ड 76% तक पहुंच गया है. स्वीडन में भी अब 57% आबादी देश के NATO में शामिल होने का समर्थन करती है, जो कि रूस-यूक्रेन युद्ध से पहले की तुलना में कहीं अधिक है.

    NATO में अपना भविष्य क्यों देख रहे हैं दूसरे देश?

    फिनलैंड की जनता के लिए यूक्रेन पर रूसी हमले ने उन परिचित खौफनाक यादों को फिर से ताजा कर दिया है, जब 1939 के अंत में सोवियत यूनियन ने उनपर आक्रमण किया था और तीन महीने से अधिक समय युद्ध चला था. फिनलैंड की नजर रूस के साथ लगे अपनी 1340 KM की बॉर्डर पर है, और वह खुद से सवाल कर रहा है कि “क्या हमारे साथ भी रूस ऐसा कर सकता है?” दूसरी तरफ हाल के वर्षों में स्वीडन ने भी रूस की तरफ से खतरा महसूस किया है. कई बार रूस के सैन्य विमान स्वीडन की संप्रभुता का उल्लंघन कर उसके एयरस्पेस में घुस चुके हैं. 2014 में स्वीडन को उन रिपोर्टों ने सन्न कर दिया गया था कि एक रूसी पनडुब्बी स्टॉकहोम द्वीपसमूह आ गयी है.

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    फिनलैंड के नाटो का सदस्य बनने से रूस को क्या नुकसान?

    फिनलैंड को नाटो का सदस्य बनने से रूस को उत्तर की तरफ से भी खतरा महसूस हो सकता है. इसके अलावा रूस का प्रमुख शहर और आर्थिक राजधानी सेंट पीटर्सबर्ग भी असुरक्षित हो सकता है. फिनलैंड बाल्टिक सागर के किनारे बसा देश है. ऐसे में अगर नाटो चाहे तो एस्टोनिया और फिनलैंड के बीच नाकेबंदी कर रूस को घेर सकता है. एस्टोनिया पहले से ही नाटो का सदस्य है. इस कारण पूरे बाल्टिक सागर में रूस की आवाजाही प्रभावित हो सकती है. इतना ही नहीं, रूस का समुद्री व्यापार भी ठप पड़ सकता है. यही कारण है कि रूस नहीं चाहता है कि नाटो उसकी उत्तरी सीमा के करीब पहुंचे.

    रूस अब फिनलैंड को धमकी क्यों दे रहा है?

    रूस की नाराजगी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि फिनलैंड के ऐलान के चंद घंटे में ही क्रेमलिन ने बयान जारी कर चेतावनी दे दी है. बयान में कहा गया है कि फिनलैंड का नाटो में शामिल होना रूस के लिए सीधा खतरा है. इतना ही नहीं, रूस ने इसके जवाब में कार्रवाई की भी धमकी दे दी है.

    पुतिन के पास क्या हैं विकल्प?

    अगर सैन्य ताकत की बात की जाए तो रूस तो दूर फिनलैंड यूरोप के भी कई छोटे-छोटे देशों के मुकाबले काफी कमजोर है. ऐसे में राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन फिनलैंड सीमा पर भारी हथियारों की तैनाती कर सकते हैं. इससे फिनलैंड के ऊपर एक तरह का मनोवैज्ञानिक दबाव बढ़ेगा. इतना ही नहीं, रूसी सेना फिनलैंड की सीमा पर चौकसी और अपनी गतिविधियों को भी बढ़ा सकती है. इससे भी फिनलैंड की अपेक्षकृत कमजोर फौज पर भारी दबाव पड़ेगा.

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    FIRST PUBLISHED : May 13, 2022, 11:22 IST

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