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सिनेमा का सम्मोहन किसमें होता है? देखने वालों में, जिसे सहृदय कहा जाता है. हालांकि यह सम्मोहन साहित्य या चित्रकला से अलग होता है. सिनेमा संगीत की तरह समय में आबद्ध होता है पर असल में सिनेमा एक ऐसी कला है जिसमें तकनीक का हस्तक्षेप रहता है. यही कारण है कि तकनीक बदलने के साथ फिल्में पुरानी भी पड़ जाती है. मसलन, पचास साल पहले फिल्में भले अच्छी बनी हो लेकिन वह आज हमें उस रूप में आकर्षित नहीं करती जिस रूप में वह रिलीज होने के वक्त थी. अपवाद भले हों. फिल्में हालांकि हमारी स्मृतियों का हिस्सा बनी रहती हैं.

पिछली पीढ़ी के पास सिनेमा देखने के अपने किस्से हैं. हाल ही में टेलीविजन पर ‘खानदान’ (1965) फिल्म देखते हुए मां ने कहा कि ‘यह फिल्म मेरी शादी के आस-पास रिलीज हुई थी. तुम्हारे पापा ने इसे दरभंगा में देखा था और मुझसे देखने कहा था. मैंने इसे गाँव के पास के कस्बे सकरी के सिनेमा घर में देखा था. उस समय एक रुपए का टिकट होता था.’ अब जब पापा नहीं रहे यह फिल्म मां की स्मृतियों में नॉस्टेलजिया की तरह आया है. सवाल है कि एक फिल्मकार किस रूप में सिनेमा के साथ अपने संबंध को देखता है? जाहिर है एक निर्देशक पर सिनेमा का जादू आम दर्शक से भिन्न होता है.

पैन नलिन की गुजराती फिल्म ‘छेल्लो शो’ (आखिरी शो) को ऑस्कर के लिए शॉर्टलिस्ट किया गया है. भारत की ओर से यह फिल्म ‘बेस्ट इंटरनेशनल फीचर फिल्म कैटेगरी’ के लिए आधिकारिक रूप से भेजी गई थी. ‘छेल्लो शो’ नौ साल के ऐसे बच्चे की कहानी है जो आगे चल कर एक फिल्मकार बनता है. उस बच्चे के सिनेमा के प्रति सम्मोहन, दुर्निवार आकर्षण को फिल्म खूबसूरत ढंग से चित्रित करती है. एक निश्छलता है यहां.

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इस फिल्म से पहले ‘संसार (2001)’ और ‘वैली ऑफ फ्लावर (2006)’ से पैन नलिन की अंतरराष्ट्रीय फिल्म जगत में काफी प्रतिष्ठा मिली थी. दोनों ही फिल्में सेक्स के अकुंठ चित्रण को ले कर दर्शकों के बीच काफी चर्चा में रही थी. ये फिल्में फ्रांस, जापान और जर्मनी के सहयोग से बनी थी, जो पश्चिमी दर्शक वर्ग के लिए बनाई गई प्रतीत होती है. इसके उलट ‘छेल्लो शो’ में एक कस्बाई बच्चा, समय, सिनेमा के जादू में इस कदर गिरफ्तार है कि उसे पढ़ने-लिखने में मन नहीं लगता. गुजरात के सौराष्ट्र इलाके में वह स्कूल से भाग कर, रेल पकड़ कर नजदीक के कस्बे में सिनेमा देखने आता है. यहां उसकी दोस्ती एक प्रोजेक्शनिस्ट (जो प्रक्षेपण के माध्यम से परदे पर सिनेमा दिखाने के लिए जिम्मेदार होता था) से होती है. अपने ‘लंच बॉक्स’ की अदला-बदली से उसे मुफ्त में फिल्म को देखने मिल जाती है. यहाँ वह प्रकाश और फिल्म के खेल को समझता है.

इस फिल्म में रेल का रूपक बार-बार आता है. यहां रेल की यात्रा सिनेमा की यात्रा प्रतीत होती है. असल में, यह एक आत्म-कथात्मक फिल्म है. पैन नलिन आज अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त फिल्म निर्देशक हैं. उनका जन्म गुजरात के एक गांव में हुआ. पिता रेलवे कैंटीन चलाते थे और उनका बचपन रेलगाड़ी के सानिध्य में बीतता था. सिनेमा बनाने की इच्छा ने उन्हें आगे के अध्ययन के लिए बड़ौदा जाने को प्रेरित किया.

समय (भाविन रबारी) अपने पिता से कहता है: “मैं प्रकाश का अध्ययन करना चाहता हूं. प्रकाश से वार्ता (स्टोरी) बनती है. और वार्ता से फिल्म.” यह फिल्म जहां एक निर्देशक के आत्म का निरूपण है वहीं सिनेमा प्रक्षेपण की तकनीक में आए बदलाव को भी खूबसूरती से दिखाती है. साथ ही रील से गायब होने से एक फिल्मकार की नजर में रंगों की दुनिया कैसी बदली इसे भी आखिर में कलात्मकता के साथ फिल्माया गया है. यहां संवाद बेहद कम हैं. सिनेमा का समाज में ‘आर्काइवल’ (संग्रहण) महत्व भी है, ‘छेल्लो शो’ फिल्म यह बखूबी हमारे सामने लेकर आती है.

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पिछली सदी के आखिरी दशक में भूमंडलीकरण के साथ आई नई तकनीक ने समाज के हर हिस्से को प्रभावित किया है. सिनेमा पर इसका प्रभाव खास तौर पर पड़ा. न सिर्फ सिनेमा बनाने की तकनीक (सेल्यूलाइड से डिजिटल की यात्रा) को इसने प्रभावित किया है, बल्कि वितरण, सिनेमा देखने-दिखाने को भी. अब सिनेमा देखने के लिए सिनेमाहॉल के बंद कमरे की जरूरत नहीं रही, इसे घर बैठे टेलीविजन, मोबाइल-लैपटॉप पर बार-बार देखा जा सकता है. बार-बार इसे स्ट्रीम किया जा सकता है. ‘छेल्लो’ शो भी सिनेमा हॉल से उतर कर आज नेटफ्लिक्स पर स्ट्रीम हो रही है. इस फिल्म में प्रोजेक्शनिस्ट फजल समय से कहता है कि ‘भविष्य कहानी कहने वालों की है’. सिनेमा का भविष्य भी बदलते तकनीक से जुड़ा है. कहानी किस रूप में कही जाएगी यह भी भविष्य के गर्भ में है, पर एक बात स्पष्ट है कि कहानी कहने का वही रूप नहीं रह जाएगा जो डिजिटल के पहले था.

यह फिल्म एक तरह से पूर्व के फिल्मकारों को श्रद्धांजलि भी है. अनायास नहीं कि आखिर में हम सत्यजीत रे, गुरुदत्त, फेलिनी, गोदार, आजेंस्टाइन, चार्ली चैपलिन जैसे फिल्मकारों का नाम सुनते हैं. ‘छेल्लो शो’ देखते हुए इटालियन निर्देशक जिएसेपे टोर्नटोर की ऑस्कर विजेता फिल्म ‘सिनेमा पैराडिसो’ (1988) की याद आती है. विषय-वस्तु में समानता भले दिखे, गुजरात का लैंडस्केप, रंग और ध्वनि इस फिल्म को ठेठ भारतीय बनाते हैं. गुजराती फिल्म का इतिहास भारतीय सिनेमा जितना ही पुराना है, लेकिन मुख्यधारा के मीडिया में इसकी चर्चा नहीं होती.

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अरविंद दासपत्रकार, लेखक

लेखक-पत्रकार. ‘मीडिया का मानचित्र’, ‘बेखुदी में खोया शहर: एक पत्रकार के नोट्स’ और ‘हिंदी में समाचार’ किताब प्रकाशित. एफटीआईआई से फिल्म एप्रिसिएशन का कोर्स. जेएनयू से पीएचडी और जर्मनी से पोस्ट-डॉक्टरल शोध.

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