विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने हाल ही में उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति-आधारित भेदभाव को खत्म करने और प्रवेश प्रक्रियाओं को सरल बनाने के लिए कुछ नए नियम लागू किए हैं। हालाँकि, इन नियमों के पीछे का इरादा समावेशी बताया जा रहा है, लेकिन बारीक विश्लेषण करने पर इनमें कई ऐसी ‘खामियां’ नज़र आती हैं जो सामान्य वर्ग (General Category) के छात्रों और प्रोफेसरों के लिए चिंता का विषय बन गई हैं।
1. झूठी शिकायतों पर अंकुश लगाने वाले ‘सुरक्षा कवच’ का खात्मा
सबसे बड़ी कमी 2012 के पुराने नियमों में बदलाव को लेकर है। पहले के नियमों में यह प्रावधान था कि यदि कोई जानबूझकर झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायत दर्ज करता है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती थी। नए नियमों में इस प्रावधान को हटा दिया गया है। इससे सामान्य वर्ग के शिक्षकों और छात्रों में यह डर है कि निजी रंजिश निकालने के लिए इन नियमों का दुरुपयोग किया जा सकता है, क्योंकि गलत शिकायत करने वाले को अब किसी दंड का भय नहीं रहेगा।
2. ‘एकतरफा’ शिकायत तंत्र: क्या सामान्य वर्ग का उत्पीड़न संभव नहीं?
नए इक्विटी रेगुलेशन (Equity Regulations) मुख्य रूप से SC, ST, OBC और EWS वर्गों को सुरक्षा प्रदान करते हैं। आलोचकों का तर्क है कि भेदभाव किसी के साथ भी हो सकता है, लेकिन ये नियम सामान्य वर्ग के छात्रों या संकाय सदस्यों के लिए ‘रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन’ (विपरीत भेदभाव) की स्थिति में कोई स्पष्ट सुरक्षा तंत्र प्रदान नहीं करते। यह एक ‘विधिक शून्य’ (legal vacuum) पैदा करता है जहाँ कैंपस का एक बड़ा हिस्सा खुद को असुरक्षित महसूस कर रहा है।
3. पीएचडी में ‘नेट’ स्कोर की अनिवार्यता: ग्रामीण और सामान्य मेधा को चोट
यूजीसी ने अब विश्वविद्यालयों की अपनी प्रवेश परीक्षाओं की जगह ‘नेट’ (NET) स्कोर को पीएचडी एडमिशन का आधार बना दिया है। इसकी कमियां इस प्रकार हैं:
- अनुसंधान क्षमता बनाम सामान्य ज्ञान: नेट एक पात्रता परीक्षा है जो व्यापक ज्ञान (Breadth of Knowledge) की जाँच करती है, जबकि पीएचडी के लिए छात्र की विशिष्ट विषय में गहराई और रिसर्च एप्टीट्यूड (Depth of Research) की आवश्यकता होती है।
- ग्रामीण छात्रों के लिए कठिन: केंद्रीयकृत परीक्षाओं (जैसे नेट) का झुकाव अक्सर उन छात्रों की ओर होता है जिनके पास कोचिंग और संसाधनों तक पहुंच है, जिससे ग्रामीण पृष्ठभूमि के मेधावी छात्र पीछे छूट सकते हैं।
4. विश्वविद्यालय की स्वायत्तता (Autonomy) का हनन
प्रत्येक विश्वविद्यालय की अपनी संस्कृति और विशेषज्ञता होती है। सभी विश्वविद्यालयों पर एक ही ‘सामान्य नियम’ थोपने से उनकी स्वायत्तता कम होती है। अब विश्वविद्यालय अपनी जरूरतों और शोध की गुणवत्ता के आधार पर अपने छात्र खुद नहीं चुन पाएंगे, उन्हें पूरी तरह से यूजीसी के मानकों पर निर्भर रहना होगा।
5. शैक्षणिक माहौल में अविश्वास और निगरानी
कैंपस में 24/7 हेल्पलाइन और विशेष ‘स्क्वाड’ (Squads) की तैनाती जैसे नियम विश्वविद्यालय के मुक्त और स्वतंत्र वातावरण को एक ‘निगरानी क्षेत्र’ में बदल सकते हैं। इससे प्रोफेसरों के बीच एक डर का माहौल पैदा हो रहा है, जिससे वे कक्षा में संवेदनशील विषयों पर खुलकर चर्चा करने से कतरा सकते हैं।
निष्कर्ष
समानता किसी भी सभ्य समाज का आधार है, लेकिन यह ‘पक्षपाती’ नहीं होनी चाहिए। यूजीसी के नए नियमों में निष्पक्ष जांच प्रक्रिया और सभी वर्गों (सामान्य सहित) के लिए समान सुरक्षा तंत्र का अभाव इसे विवादों के घेरे में खड़ा करता है। यदि इन खामियों को दूर नहीं किया गया, तो यह सुधार के बजाय संस्थानों में विभाजन का कारण बन सकता है।




