blank

नई दिल्ली: देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव को रोकने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा जारी किए गए नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम रोक लगा दी है। कोर्ट ने इन नियमों को प्रथम दृष्टया “अस्पष्ट” और “दुरुपयोग के लायक” बताया है।

मुख्य विवाद क्या है?

​UGC ने 13 जनवरी 2026 को ‘Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026’ अधिसूचित किया था। विवाद इसकी धारा 3(c) को लेकर है, जिसमें “जाति-आधारित भेदभाव” को केवल अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के खिलाफ होने वाले व्यवहार तक सीमित रखा गया था।

​याचिकाकर्ताओं (विनीत जिंदल और अन्य) का तर्क था कि यह नियम ‘सामान्य वर्ग’ (General Category) के छात्रों और शिक्षकों को सुरक्षा के दायरे से बाहर रखता है, जो संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन है।

सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी

blank

​चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जोयमालया बागची की पीठ ने सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ कीं:

  • दुरुपयोग की आशंका: कोर्ट ने कहा कि नियमों की परिभाषा इतनी अस्पष्ट है कि इनका गलत इस्तेमाल हो सकता है।
  • विभाजनकारी नीति: सीजेआई ने चिंता जताते हुए पूछा, “क्या हम एक जातिविहीन समाज बनाने की दिशा में हासिल की गई उपलब्धियों से पीछे जा रहे हैं? शिक्षण संस्थानों में बच्चों को जातियों के आधार पर नहीं बांटना चाहिए।”
  • कमेटी बनाने का सुझाव: कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि प्रख्यात न्यायविदों और विशेषज्ञों की एक कमेटी बनाई जाए जो सामाजिक मूल्यों को ध्यान में रखकर इन नियमों की समीक्षा करे।

अब आगे क्या होगा?

  1. पुराने नियम बहाल: जब तक कोर्ट इस मामले पर अंतिम फैसला नहीं सुनाता, तब तक 2012 के पुराने नियम ही प्रभावी रहेंगे।
  2. सरकार से जवाब तलब: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और UGC को नोटिस जारी कर 19 मार्च 2026 तक जवाब मांगा है।
  3. संशोधन की संभावना: कोर्ट ने सरकार से नियमों को दोबारा ड्राफ्ट (Redraft) करने को कहा है ताकि यह समावेशी हो और किसी खास वर्ग के खिलाफ भेदभावपूर्ण न लगे।
Reactions:

Leave a Reply