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रिपोर्ट: हिमांशु जोशी

पिथौरागढ़. उत्तराखंड के पहाड़ी इलाके हमेशा से अनेक जड़ी-बूटियों का केंद्र रहे हैं. यहां जंगलों में कई दुर्लभ जड़ी-बूटियां आज भी पाई जाती हैं, जिनका इस्तेमाल निरोग रहने में आदिकाल से चलते आ रहा है. सीमांत जिला पिथौरागढ़ जो हिमालय से लगा इलाका है और यहां के लोग भी सदियों से इन्हीं जड़ी-बूटियों के सहारे स्वस्थ रहते आए हैं. जंगलों में पाई जाने वाली इन जड़ी-बूटियों को अब यहां के लोग खेतों में भी उगा रहे हैं. ग्रामीणों ने व्यापक स्तर पर इसका उत्पादन करके अपनी जीविका को बेहतर किया है. जबकि शरदोत्सव मेले में ये जड़ी-बूटियां मिल रही हैं.

हिमालय की इन दुर्लभ जड़ी-बूटियों को बेचने के लिए काश्तकार इन्हें शरदोत्सव मेले में लाए हैं, जिसकी जमकर खरीदारी हो रही है.दारमा क्षेत्र से जड़ी-बूटियों को शरदोत्सव मेले में बेचने के लिए लाए यहां के जड़ी-बूटी उत्पादक किशन बौनाल बताते हैं कि वह ऑर्गेनिक तरीके से इन जड़ी-बूटियों की खेती कर रहे है, जिसमें गन्दरयां जो पेट दर्द से संबंधित रोगों के इलाज में काम आती है. कुटकी जो बुखार और पीलिया के रोग में सदियों से इस्तेमाल हो रही है. बालजड़ी सिर की मालिश करने के काम आती है. इसके साथ ही तिमूर, जम्बू समेत कई जड़ी-बूटियां वह इस मेले में बेचने के लिए लाए हैं. शरदोत्सव मेले में काफी अच्छी बिक्री हो रही है.उन्होंने राज्य सरकार से जड़ी-बूटी उत्पादकों को प्रोत्साहन देने के लिए मेले जैसे आयोजनों में निशुल्क स्टॉल देने की मांग भी की है.

बता दें कि पिथौरागढ़ के उच्च हिमालयी क्षेत्र दारमा वैली के बौन गांव में जड़ी-बूटियों की खेती होती है. इस वजह से बौन गांव जिले का पहला ‘हर्बल विलेज’ भी बन गया है. जड़ी-बूटी उत्पादन यहां के लोगों का व्यवसाय बनकर उभरा है. यहां के स्थानीय निवासी और पूर्व सरपंच किशन राम बौनाल ने जानकारी देते हुए बताया कि जो जड़ी-बूटियां हमारे पूर्वज जंगलों से लाते थे, आज उनकी खेती व्यापक स्तर पर हो रही है, जिससे बौन गांव को एक नई पहचान मिली है.

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दारमा घाटी धौली नदी के आसपास बसी है, जिसके अन्तर्गत 14 गांव आते हैं. यहां पारम्परिक तरीके के जम्बू, कुटकी, गंदरायन, अतीस, कुठ, काला जीरा सहित अन्य जड़ी-बूटियों की खेती व्यापार स्तर पर हो रही है. दारमा घाटी में ही प्रसिद्ध पंचाचूली पर्वत मौजूद है, जिसकी तलहटी में दारमा वैली के गांव बसे हैं.

पिथौरागढ़ के जड़ी-बूटी शोध संस्थान के मास्टर ट्रेनर एनडी जोशी ने बताया कि 2009 में इस इलाके में औषधीय पौधों की खेती के लिए सर्वेक्षण किया गया था. उस समय यहां के लोगों को जड़ी-बूटियों की खेती के प्रति रुझान कम था. संस्थान द्वारा पौधे उपलब्ध कराकर यहां के लोगों को जड़ी-बूटी उत्पादन के लिए प्रेरित किया गया, जिसका परिणाम यह रहा कि आज यहां के गांव जड़ी-बूटी की खेती के लिए जाने जाते हैं, जिससे ग्रामीणों को आय के बेहतर साधन मिले हैं. जड़ी-बूटी की खेती उच्च हिमालयी क्षेत्रों के लोगों का मुख्य रोजगार बनकर उभरी है.

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