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House of Secrets: The Burari Deaths Review: मधुबनी, बिहार से आये और दिल्ली में झुग्गी के बच्चों को मुफ्त शिक्षा देने के समाजोपयोगी कार्य में लगे युवक संजीव झा ने 2013 में अपना राजनैतिक सफर आरम्भ किया. वो आम आदमी पार्टी के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़े गए. 2015 में चुनाव फिर हुए और वो एक बार फिर जीत गए. अन्ना हज़ारे के ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ में संजीव महती भूमिका निभाई. जमीन से जुड़े इस कार्यकर्त्ता को अरविन्द केजरीवाल ने बीजेपी के गढ़ में सेंध लगाने के लिए तैयार किया. तमाम शिक्षा और राजनीति जानना एक तरफ और अपने विधानसभा क्षेत्र में एक ही परिवार के 11 लोगों द्वारा एक साथ की गयी संदिग्ध आत्महत्या का सामना करना दूसरी तरफ. संजीव झा के विधानसभा क्षेत्र बुराड़ी में संत नगर के दो मंजिला मकान में 1 जून 2018 को चुण्डावत उर्फ भाटिया परिवार के 11 लोगों की लाशें मिली. 10 तो छत पर फंदा लगा कर लटके हुए मिले थे और सबसे सीनियर, उनकी माताजी की दूसरे कमरे में गाला घोंट कर हत्या कर दी गयी थी. दिल्ली ही नहीं पूरा देश इस घटना से कांप गया था. नेटफ्लिक्स पर 3 एपिसोड की ट्रू क्राइम डॉक्यूमेंट्री ‘हाउस ऑफ सीक्रेट्स : द बुराड़ी डेथ्स’ ने इस अपराध के पीछे के मनोविज्ञान को समझने की कोशिश की है.

फिल्म मेकर लीना यादव और उनकी फिल्म ‘राजमा चावल’ में उनके असिस्टेंट अनुभव चोपड़ा ने मिल कर इस खूंखार और दिल दहलाने वाले ट्रू क्राइम डॉक्यूमेंट्री निर्देशित की है. ये चेताना ठीक होगा कि कमज़ोर दिल वाले इसे न ही देखें. हालांकि जुगुप्सा पैदा करनेवाला कोई दृश्य नहीं है और न ही लाशों को लटकते हुए दिखाया गया है. इस डॉक्यूमेंट्री का संगीत, फिल्मांकन और एक-एक शख्स का इंटरव्यू इतना ह्रदय विदारक है कि आप बरबस ही कांप उठाते हैं. भारत में इस तरह की डॉक्यूमेंट्री का रिवाज है नहीं, जबकि नेटफ्लिक्स पर इस तरह की कई विदेशी डॉक्यूमेंट्री मौजूद हैं और लोग उन्हें बहुत पसंद करते हैं. ‘हाउस ऑफ सीक्रेट्स’ इस तरह की पहली भारतीय डॉक्यूमेंट्री है जो एक जघन्य अपराध के पीछे के मनोविज्ञान को खंगालती है. परिवार के एक शख्स की बिगड़ी हुई मानसिक स्थिति से कैसे विभ्रम की परिस्थितयां सामने आती हैं और पूरा परिवार, एक अनजान डर की वजह से, जो उन्हें कहा जाता है वो करता है. दुःख ये है कि वो इस बार अपनी जान गंवा बैठते हैं.

80 साल की नारायणी देवी, उनकी बड़ी बेटी प्रतिभा भाटिया (57 साल) और उनकी बेटी प्रियंका (33 साल), बड़ा बेटा भवनेश (50 साल), उसकी पत्नी सविता (48 साल) और उनकी बेटियां नीतू (25 साल), मोनू (23 साल) और बेटा ध्रुव (15 साल). नारायणी देवी का छोटा बेटा ललित (45 साल), उसकी पत्नी टीना (42 साल) और उनका एकलौता बेटा शिवम् (15 साल) सब एक साथ रहते थे. इस पूरे घटनाक्रम का मुख्य करता धर्ता ललित था. वैसे तो ललित बड़ा सभ्य और सुशील व्यक्ति था लेकिन एक रोड एक्सीडेंट में सिर पर चोट लगने से और बाद में एक और भयावह हादसे की वजह से उसकी आवाज चली गयी थी और उसके व्यक्तित्व में भयानक परिवर्तन आ गया था.

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इनके पिता की मृत्यु 2007 में हुई और कुछ समय बाद ललित ने पूरे परिवार से कहना शुरू कर दिया कि उसके पिता की आत्मा उसके अंदर आ गयी है. घरवालों को थोड़ा अजीब लगा लेकिन ललित काफी कुछ अपने पिता की ही तरह व्यव्हार करता था. उसकी कही बातें मानी जाने लगी. उसी के कहने पर घरवालों ने किराने की दुकान खोली और फिर प्लाईवुड और हार्डवेयर की. घर का भाग्य चल निकला. ललित रोज एक डायरी में अपने पिता के कहे वचन लिखता था और सभी घरवालों को उसे पढ़कर उसका पालन करना होता था. धीरे-धीरे सभी सदस्य डायरी लिखने लगे. रोजमर्रा की बातों के अलावा सच्चे मार्ग पर कैसे चला जाए जैसे धार्मिक विचार, किस दिन कौन सी पूजा होगी, कौन किस को क्या बोलेगा, सभी के व्यव्हार का विश्लेषण ऐसी तमाम बातें लिखी जाती थी. हालांकि आत्महत्या की रात को सब कुछ सामान्य था, अड़ोस पड़ोस के लोग उनसे मिले, दुकान पर सौदे हुए यानि जिन्दगी सामान्य रूप में थी. फिर रात को पूरे परिवार ने एक साथ रस्सी, दुपट्टे, साड़ियों की मदद से छत से लटक कर आत्महत्या कर ली. नारायणी देवी चूंकि बूढी थी इसलिए वो लटक नहीं सकती थीं तो उनका गला अलग से दबाया गया था. कुछ सदस्यों के हाथ पैर बंधे थे और सबकी आंखों पर पट्टी बंधी थी.

लीना यादव ने इस डॉक्यूमेंट्री के लिए काफी मेहनत की है. टेलीविजन रिपोर्ट्स, अखबार की कटिंग, क्राइम रिपोर्टर्स से बातचीत और खास तौर पर केस से सम्बंधित सभी पुलिस अफसरों से बातचीत इस डॉक्यूमेंट्री का हिस्सा हैं. संत नगर के भाटिया परिवार के पड़ोसियों से बातचीत के दृश्य आपको दहशत में ला सकते हैं. चूंकि परिवार करीब 20 साल से इस इलाके में रहता था और उनकी दो दुकानें थी, जहां रोजाना व्यापार होता था. इसके अलावा भी परिवार के सभी सभी सदस्यों की आस पड़ोस में अच्छी जान पहचान थी. ललित के कुछ मित्रों से भी बातचीत की गयी, जिन्होंने अंत में सभी के अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी निभाई थी. अलग-अलग मित्र, ललित की अलग-अलग छवि बताते हैं. सबसे खूंखार बयान पुलिस वालों के हैं जो सबसे पहले घटना स्थल पर पहुंचे और उन्होंने सभी शव घर की छत पर लगी जाली से लटके देखे और परिवार का पालतू कुत्ता पूरे समय भौंकता रहा. प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों में एक ही बात थी जो दिमाग पर हथौड़े की तरह बजती है – अपनी जिन्दगी में हमने ऐसा मंजर नहीं देखा और अब हम कभी इसे चाह कर भी भुला नहीं पाएंगे.

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इस डॉक्यूमेंट्री की कुछ ऐसी बाते हैं जो इसे बाकी किसी क्राइम डॉक्यूमेंट्री से बेहतर बनाती हैं. पुलिस वालों के इंटरव्यू में पुलिस वाले हंसते मुस्कुराते जवाब देते हैं. क्राइम केसेस सुलझाना उनके लिए रोज का काम है. ऐसा खौफनाक मंजर देखने के बावजूद उन्हें सब दुःख दर्द, सुख भुलाकर अगले केस पर काम करने के लिए निकलना ही पड़ता है. पुलिस स्टेशन के एसएचओ को अंग्रेजी बोलते हुए देखकर आपको आश्चर्य हो सकता है. पुलिस कॉन्स्टेबल्स को सुबह सुबह जब मौका-ए-वारदात पर जाना पड़ता है तो वो रात भर काम करके थका हुआ है और थोड़ी देर लेटना चाहता है लेकिन उसकी किस्मत उसे उसी के मोहल्ले ले जाती है. एक जगह लीना ने एक शॉट रखा है, जिसमें पुलिसवाला फोन पर बात कर रहा है और वो फोन करने वाले को कहता है कि बाद में बात करते हैं अभी वह एक डॉक्यूमेंट्री की शूटिंग में व्यस्त है. पुलिस का मानवीय चेहरा सिर्फ दया और करुणा का नहीं बल्कि छोटी सी उपलब्धि के गर्व का भी है. केस हालांकि क्राइम ब्रांच के पास भेज दिया गया था लेकिन इस से थाने वालों का रुतबा कम नहीं हो जाता. डॉक्यूमेंट्री में लीना और अभिनव ने जासूसी या घटना का नाट्य रूपांतरण दिखाने जैसी गलती नहीं की है. पुलिस ने केस बंद कर दिया है और अब उसमें कोई नयी जांच नहीं हो सकती लेकिन इस सामूहिक आत्महत्या के पीछे की मानसिक बीमारी को साइकोलोजिस्ट की मदद से समझाने की कोशिश की है.

गुत्थी जो अब कभी नहीं सुलझेगी वो ये है कि 42 साल का ललित जिसकी दिमागी स्थिति, एक्सीडेंट और हत्या की कोशिश की वजह से ठीक नहीं थी, उसने कैसे घर के हर सदस्य को ये झांसा दिया कि उसके अंदर पिताजी की आत्मा है. ललित की मां को कैसा लगता होगा जब उसका बेटा उसे अपनी डायरी के माध्यम से उसे निर्देश देता होगा? कैसे उसके जवान बेटे और भतीजे को उसकी बात समझ आती होगी. ऐसा क्या मोह पाश होगा कि सभी सदस्य एक साथ मरने के लिए राज़ी भी हो गए. मौत के इस अनुष्ठान में पूरे परिवार ने आहुति क्यों दी? इस केस को मीडिया ने एक सर्कस में तब्दील कर दिया था. दर्जनों रिपोर्टर्स, कैमरामैन घटनास्थल को चारों तरफ से घेर के बैठे थे. एक भी सुराग या जानकारी मीडिया के हाथ नहीं इसलिए अनुमान के आधार पर रिपोर्ट दिखाई जा रही थी. उस गली में रहने वाले किसी भी शख्स की बातचीत को असली खुलासा कह कर टीवी पर दिखाया जाता रहा. इस सर्कस में पुलिस और क्राइम ब्रांच ने चुप्पी साध रखी थी.

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एआर रहमान की संगीत अकैडमी, केएम् म्यूजिक कंज़र्वेटरी से प्रशिक्षित बच्चों के बैंड क़ुतुब-ए-कृपा ने इस डॉक्यूमेंट्री का म्यूजिक बनाया है. रहमान का सर पर हाथ हो तो प्रतिभा निखर कर सामने आती है. म्यूजिक ने इस डॉक्यूमेंट्री को बोझिल होने से बचाये रखा है. सैकड़ों घंटे का फुटेज एडिट करने के लिए भी 4 जोड़ी हाथ लगे हैं – जेम्स हेगुड़, ज़ैकरी काश्केट, एम मेलियानी और नम्रता राव. डॉक्यूमेंट्री के सह निर्देशक अनुभव चोपड़ा के पास ज़िन्दगी न मिलेगी दोबारा से लेकर दिल बेचारा जैसी करीब एक दर्ज़न फिल्मों में बड़े निर्देशकों के साथ सहायक निर्देशक के तौर पर काम किया है. मूलतः जालंधर के अनुभव ने सिनेस्तान की स्क्रिप्ट राइटिंग कम्पटीशन में चौथा स्थान हासिल किया था. लीना यादव पुराना नाम हैं. उनके द्वारा निर्देशित कुछ फिल्में हैं – ‘शब्द’, ‘तीन पत्ती’, ‘पार्च्ड’, और ‘राजमा चावल’. अपने करियर के शुरू में उन्होंने ‘से ना समथिंग टू अनुपम अंकल’ नाम का टेलीविजन शो भी निर्देशित किया था. लीना के पति असीम बजाज इस डॉक्यूमेंट्री के प्रोड्यूसर भी हैं. असीम बजाज दरअसल रंगमंच की जानी मानी हस्ती राम गोपाल बजाज के पुत्र हैं और लता मंगेशकर के आएगा आने वाला (महल) गीत के संगीत निर्देशक खेमचंद प्रकाश के नाती.

11 लोगों की मौत. 11 लोगों की आत्महत्या. 11 लोगों की लिखी हुई डायरीज का मिलना. ये डायरीज भी 11 साल से लिखी जा रही थीं. साइकोलोजिस्ट की बात मानें तो भारत के अधिकांश परिवार इसी प्रकार के हैं. अन्धविश्वास, किसी एक शख्स पर पूरी तरह निर्भरता, लॉजिक छोड़कर भूत-प्रेत-आत्मा जैसी बातें करना, पूजा-पाठ के नाम पर ऐसी धार्मिक क्रियाएं करना, जो शर्तिया नुकसान पहुंचा सकती है. इस डॉक्यूमेंट्री को देखिये. शायद अपने आस-पास होने वाले ऐसे किसी हादसे को रोक पाएंगे.

डिटेल्ड रेटिंग

कहानी :
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Tags: Film review, Netflix

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