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State of Siege: Temple Attack Review.  कमाल इस बात का नहीं है कि हम भारत में सत्य घटनाओं से इंस्पायर हो कर अब वेब सीरीज या फिल्में बनाने लगे हैं, कमाल इस बात का है कि अक्षर धाम आतंकवादी हमले की घटनाओं से प्रेरणा लेकर हम एक फिल्म देखते हैं, जिसे लिखा दो विदेशी लेखकों ने है और बहुत ही कमाल लिखा है. ज़ी5 पर हाल ही में रिलीज नयी फिल्म स्टेट ऑफ सीज: टेम्पल अटैक के लेखक हैं. विलियम बोर्थविक और साइमन फंतोजो और इन्होने इस घटना को एक थ्रिलर के रूप में ढाल कर हमें एक ऐसी फिल्म दी है, जिसे देखकर हम बड़े ही तटस्थ हो कर आतंवादियों के हमले को देखते हैं और फिर एनएसजी कमांडो द्वारा उन्हें मार गिराने की पूरी प्रक्रिया को बिलकुल सामने होते हुए देखते हैं.

कॉन्टिलो फिल्म्स पिछले कई सालों से टेलीविजन के लिए कई तरह के कार्यक्रम बनाती रही है और स्टार प्लस से लेकर ज़ी टीवी तक उनके हिट कार्यक्रमों की फेहरिस्त है. पिछले कुछ वर्षों से उन्होंने ओटीटी प्लेफॉर्म्स के लिए भी वेब सीरीज और फिल्म्स बनाना शुरू किया है और अब तक उनका रिकॉर्ड जबरदस्त है. पिछले साल उन्होंने 26/11 के मुंबई हमलों पर एक मिनी वेब सीरीज बनायीं थी “स्टेट ऑफ सीज : 26/11” जो मुंबई में हुए, दुनिया के दूसरे सबसे दुर्दांत हमले और फिर एनएसजी कमांडो द्वारा उन आतंवादियों पर विजय की एक अद्भुत गाथा है. अमेरिकी निर्देशक मैथ्यू ल्यूटवायलर और प्रशांत सिंह द्वारा निर्देशित उस वेब सीरीज की बहुत प्रशंसा होती रहती है. इसी कड़ी में अब प्रोड्यूसर अभिमन्यु सिंह और रूपाली सिंह लाये हैं “स्टेट ऑफ सीज : टेम्पल अटैक” जिसे निर्देशित किया है केन घोष ने. बहुत सालों तक म्यूजिक वीडियो और फिल्में बनाने के बाद केन पिछले कुछ समय से ऑल्ट बालाजी के लिए एडल्ट वेब सीरीज बना रहे थे. स्टेट ऑफ सीज उनके लिए एक नए तरह का जॉनर है और उन्होंने काफी अच्छा काम किया है.

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कहानी और पटकथा, 2002 में हुए अक्षरधाम मंदिर पर हुए आतंकवादी हमले और उस समय की और घटनाओं से प्रेरित हो कर लिखी गयी है. पूरी पटकथा बिलकुल एक लाइन में चलती है और इसी वजह से इस एक्शन थ्रिलर को देखने में मज़ा आता है. दिखाया गया है कि 2002 के आरम्भ में हुए दंगों में मुस्लिमों पर हुए अत्याचार का बदला लेने के लिए पाकिस्तान के आतंकवादी कृष्ण धाम मंदिर पर अटैक कर देते हैं. मंदिर में घुस कर पहले तो कई लोगों को गोली मारते हैं और फिर लोगों को बंधक बना कर जेल में बंद एक और आतंकवादी बिलाल को छुड़ाने की मांग करते हैं. उसी समय गुजरात के मुख्यमंत्री मनीष चौकसी (समीर सोनी) एक अंतर्राष्ट्रीय व्यापर सम्मलेन को सम्बोधित कर रहे होते हैं. कर्नल नागर (परवीन डबास) और उनके साथ मेजर हणुत सिंह (अक्षय खन्ना) मुख्यमंत्री को सुरक्षित स्थल पर ले जाते हैं. आतंकवादी एक एक करके बंधकों को मारना शुरू कर देते हैं. अक्षय खन्ना अपने साथियों के साथ पहुँच कर एक एक कर के आतंवादियों को मार गिराते हैं और मिशन कामयाब होता है.

कहानी में न तो आतंवादियों को सुपर हीरो या सुपर विलन बनाया है, और न ही एनएसजी के कमांडो को भगवान का अवतार. फिल्म की शुरुआत में ही एक मंत्री की अगवा की हुई बेटी को छुड़ाने का मिशन अक्षय खन्ना की टीम को मिलता है, जिसमें वो लड़की को तो बचा लेते हैं लेकिन उनका एक साथी मारा जाता है और अक्षय खुद घायल हो जाते हैं. एक छोटी कामयाबी मिलती है कि वो एक आतंकवादी बिलाल को पकड़ लेते हैं और उसका बॉस अबू हमजा भाग निकलता है. कृष्ण धाम मंदिर पर हमले की योजना अबू हमजा रचता है ताकि वो बंधकों के बदले बिलाल को छुड़ा सके.

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फिल्म के एडिटर मुकेश ठाकुर ने 112 घंटे के सीज को दो घंटे से भी कम लम्बी एक फिल्म में तब्दील किया और बहुत शानदार तरीके से किया है. एक पल के लिए भी स्क्रीन से नज़रें नहीं हटती हैं. फिल्म के अंत में बिलाल को रिहा करने से लेकर गोली मारने के बाद तक के दृश्य में हिंदी फ़िल्मी फार्मूला डाला गया है जो फिल्म की फील के साथ बिलकुल नहीं मेल खाता. संभवतः, देशभक्ति फार्मूला दिखने का मोह संवरण करना मुश्किल रहा होगा. पूरी फिल्म में अति-नाटकीयता वाले 2 या 3 ही सीन हैं बाकी पूरी फिल्म एक सच्ची घटना के समान नज़र आती है. सिनेमेटोग्राफर तेजल शेट्ये की बतौर इंडिपेंडेंट सिनेमेटोग्राफर पहली फिल्म है और उन्होंने भी फिल्म में कोई एक्स्ट्रा ड्रामेटिक शॉट्स नहीं लिए हैं.

अक्षय खन्ना हमारे लिए एक ऐसे अभिनेता हैं जिन्हें कभी भी ठीक से इस्तेमाल नहीं किया जाता. वो बीच बीच में किसी फिल्म में अपनी उपस्थिति दर्ज करा देते हैं और फिर हमें याद आता है कि वो कितने प्रतिभशाली हैं. अक्षय ओबेरॉय का छोटा सा रोल था और गौतम रोड़े का भी. विवेक दहिया के हिस्से कुछ ही सीन आये लेकिन उन्होंने प्रभाव छोड़ा है. अच्छे किरदार में समीर सोनी और परवीन डबास हैं. अभिमन्यु सिंह का रोल भी ठीक रहा. मंजरी फडनिस के पास एक दो ही सीन थे और कुछ करने को था नहीं. फिल्म पूरी अक्षय खन्ना और आतंकवादियों के कन्धों पर चलती है. इस फिल्म में पटकथा हीरो है और इसलिए ये फिल्म देखना ही चाहिए.

सच्ची घटनाओं से प्रेरित हो कर लिखी पटकथा और फिल्म का बेहतरीन नमूना है ये फिल्म. वीकेंड पर देख डालिये. छोटी फिल्म है, बस थोड़ी गाली गलौच है जिस वजह से शायद आप परिवार के साथ देखना पसंद न करें लेकिन ओटीटी प्लेफॉर्म है तो इतनी स्वतंत्रता तो निर्देशक ले ही लेता है.undefined

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डिटेल्ड रेटिंग

कहानी :
स्क्रिनप्ल :
डायरेक्शन :
संगीत :

Tags: Akshaye Khanna, Film review

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