बदलती दुनिया, बेचैन साम्राज्य और दौड़ता भारत, Modi - trump - Musk

दुनिया की राजनीति और अर्थव्यवस्था का एक अनलिखा नियम है – जब ताकत का संतुलन बदलता है, तब सबसे ज्यादा शोर वही करते हैं जिनकी कुर्सी हिल रही होती है। हाल में वैश्विक विकास में देशों के योगदान को लेकर आए आंकड़ों ने यही कहानी फिर दोहरा दी। एशिया आगे बढ़ रहा है, भारत दौड़ रहा है, और पुरानी महाशक्तियां पहली बार आईने में अपनी थकान देख रही हैं।

जब कोई उद्योगपति, जो खुद को भविष्य का ठेकेदार समझता हो, “पावर बैलेंस बदल रहा है” जैसा वाक्य लिखता है, तो वह केवल सूचना नहीं देता – वह अपनी चिंता की खिड़की भी खोल देता है। यह चिंता स्वाभाविक है। दशकों तक दुनिया को यह समझाया गया कि नवाचार, पूंजी और प्रभाव का एकाधिकार कुछ गिने चुने देशों के पास रहेगा। पर अर्थव्यवस्था लोकतांत्रिक होती है – जहां मेहनत, जनसंख्या, बाजार और धैर्य मिलते हैं, वहां विकास रास्ता बना ही लेता है।

अमेरिका की बेचैनी और टैरिफ का हथियार

पिछले कुछ वर्षों में हमने एक दिलचस्प प्रवृत्ति देखी है। जब प्रतिस्पर्धा कठिन लगे, तो नियम बदल दो। जब बाजार छिनता दिखे, तो टैरिफ लगा दो। जब तकनीक साझा करनी पड़े, तो सुरक्षा का हवाला दे दो। यह नया नहीं है, बस अब खुलकर दिख रहा है।

डोनाल्ड ट्रंप की शैली तो और भी अलग रही। वे कूटनीति को अक्सर रियलिटी शो की तरह चलाते हैं – ऊंची आवाज, त्वरित बयान, और हर मुद्दे को निजी जीत या हार बना देना। टैरिफ को उन्होंने आर्थिक नीति से ज्यादा राजनीतिक हथौड़ा बना दिया। पर वैश्विक अर्थव्यवस्था शतरंज है, कुश्ती नहीं। यहां हर चाल का जवाब तुरंत नहीं, सही समय पर दिया जाता है।

भारत का रवैया – न झुकना, न रुकना

भारत ने पिछले दशक में एक दिलचस्प संतुलन साधा है। एक तरफ रणनीतिक साझेदारी, दूसरी तरफ रणनीतिक स्वायत्तता। दबाव आए, बयान आए, कभी प्रशंसा, कभी आलोचना – पर दिशा वही रही जो राष्ट्रीय हित में समझी गई।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शैली पर मतभेद हो सकते हैं, पर एक बात साफ है – वे सार्वजनिक तमाशे में कम और नियंत्रित प्रतिक्रिया में ज्यादा विश्वास रखते हैं। अंतरराष्ट्रीय मंच पर वे हर बयान का जवाब उसी मंच पर नहीं देते। कई बार चुप्पी भी नीति होती है। कई बार मुस्कान भी संदेश होती है।

कूटनीति में यह कला महत्वपूर्ण है कि किस मुद्दे पर बोलना है, किस पर नहीं, और किस पर बाद में बोलना है। वैश्विक राजनीति में हर उकसावे का जवाब देना जरूरी नहीं। कभी-कभी सामने वाले को उसकी ही आवाज में थकने देना भी रणनीति होती है।

जन्मदिन की शुभकामनाएं और प्रतीकात्मक शक्ति

सैकड़ों विश्व नेताओं का किसी एक नेता को सार्वजनिक शुभकामनाएं देना केवल औपचारिकता नहीं होता। यह संकेत होता है कि वह नेता वैश्विक नेटवर्क में कितनी जगह रखता है। अंतरराष्ट्रीय संबंध केवल समझौतों से नहीं चलते, वे धारणा, पहुंच और व्यक्तिगत समीकरण से भी चलते हैं।

भारत का कद बढ़ने का मतलब यह नहीं कि बाकी गिर रहे हैं। इसका मतलब है कि मेज अब गोल हो रही है, जहां पहले कुछ ही कुर्सियां थीं।

क्या हम सच में “विश्वगुरु” बन सकते हैं

यह शब्द भावनात्मक है, पर इसके पीछे वास्तविक प्रश्न छिपा है – क्या भारत ज्ञान, अर्थव्यवस्था, नीति और नैतिक नेतृत्व में अग्रणी बन सकता है?

संभावना है, पर शर्तें भी हैं।

सबसे बड़ी बाधाएं बाहर नहीं, भीतर हैं –

  • भ्रष्टाचार
  • कमजोर नागरिक अनुशासन
  • सार्वजनिक संपत्ति के प्रति उदासीनता
  • जाति आधारित सोच
  • नियमों को विकल्प समझने की आदत

सुपरपावर बनने से पहले सभ्य समाज बनना पड़ता है। जीडीपी से पहले जीडीपी का व्यवहार आता है – यानी हम सार्वजनिक जगह पर कैसे रहते हैं, कानून का पालन कैसे करते हैं, और दूसरों के अधिकार का सम्मान कितना करते हैं।

जाति, वर्ण और वास्तविक सामाजिक प्रश्न

भारत का सामाजिक ढांचा जटिल रहा है। पर एक बात बार-बार इतिहास में दिखती है – चरित्र की पूजा लंबे समय तक टिकती है, जन्म की नहीं। प्रभु राम और रावण की कथा को देखें। रावण विद्वान था, कुलीन था, पर उसका अहंकार उसे सम्मान नहीं दिला पाया। चरित्र बिगड़ जाए तो वही रावण, जो कैलाश पर्वत को भगवान शिव और माँ अम्बा सहित उठाकर माथे पर धारण कर लेता था, उसकी खोपड़ी से वानर सेना फुटबॉल खेल रही थी। अंत में प्रतीक क्या बचा – उसका ज्ञान या उसका पतन?

वर्ण व्यवस्था का मूल सिद्धांत कर्म आधारित बताया जाता है, पर समय के साथ वह जन्म आधारित कठोर ढांचे में बदल गया। आधुनिक भारत में यह बहस फिर लौट रही है – क्या पहचान जन्म से तय होगी या कर्म से?

सामाजिक एकता और “बंटेंगे तो कटेंगे” जैसे नारे साथ-साथ नहीं चल सकते। एकता का मतलब समान अवसर है, न कि समान पहचान। विविधता भारत की ताकत रही है, बशर्ते वह विभाजन में न बदले।

नीतियां और असहमति

किसी भी सरकार की नीतियों पर मतभेद होना लोकतंत्र की पहचान है। शिक्षा से जुड़े बदलाव, संस्थागत सुधार, या नियामक ढांचे में परिवर्तन अक्सर बहस पैदा करते हैं। यह स्वाभाविक है। सवाल यह है कि बहस संवाद बने या ध्रुवीकरण।

लोकतंत्र में नेता जमीन तभी खोता है जब संवाद खोता है। लोकप्रियता स्थायी नहीं होती, भरोसा ज्यादा टिकाऊ होता है।

दौड़ता भारत – पर किस दिशा में

भारत आज दुनिया की सबसे युवा आबादी वाले देशों में है। डिजिटल अर्थव्यवस्था बढ़ रही है। स्टार्टअप संस्कृति मजबूत हो रही है। इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश बढ़ा है। वैश्विक कंपनियां भारत को बाजार और मैन्युफैक्चरिंग बेस दोनों की तरह देख रही हैं।

पर असली सवाल है – क्या यह विकास समावेशी है?
क्या गांव और शहर साथ बढ़ रहे हैं?
क्या शिक्षा रोजगार से जुड़ रही है?
क्या नीति स्थिरता निवेश को भरोसा दे रही है?

यदि इन सवालों के जवाब सकारात्मक रहे, तो भारत की रफ्तार केवल तेज नहीं, टिकाऊ भी होगी।

दुनिया क्यों देख रही है

आज वैश्विक अर्थव्यवस्था का केंद्र धीरे-धीरे एशिया की ओर झुक रहा है। जनसंख्या, बाजार आकार, डिजिटल अपनापन और विकास दर मिलकर नई कहानी लिख रहे हैं। यह बदलाव अचानक नहीं आया। दशकों की तैयारी का परिणाम है।

पुरानी महाशक्तियों के लिए यह असहज हो सकता है, पर वैश्विक व्यवस्था स्थिर तभी रहती है जब अवसर फैलते हैं।

भारत के सामने मौका है – शिकायत करने का नहीं, निर्माण करने का।
तुलना करने का नहीं, सुधार करने का।
दुनिया को उपदेश देने से पहले खुद उदाहरण बनने का।

विश्वगुरु का दर्जा घोषणाओं से नहीं मिलता। वह मिलता है जब दुनिया सीखने आए, सुनने नहीं।

और जहां तक वैश्विक दिग्गजों की बेचैनी का सवाल है – यह इतिहास का हिस्सा है। हर उभरती शक्ति के साथ ऐसा हुआ है। असली प्रश्न यह नहीं कि कौन असहज है। असली प्रश्न यह है कि हम कितने तैयार हैं।

भारत अब चल नहीं रहा। दौड़ रहा है।
बस ध्यान इतना रहे कि दिशा सही हो, और रास्ते में अपने ही लोगों को पीछे न छोड़ दें।

This piece is written by Saurabh Pandey.

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