सुप्रीम कोर्ट ने ठेका श्रमिकों से संबंधित एक मामले में स्पष्ट किया है कि यदि कोई कंपनी या संस्थान ठेका श्रमिकों की जगह नियमित कर्मचारियों को नियुक्त करने का निर्णय लेता है, तो उसे पहले काम कर चुके ठेका श्रमिकों को अवसर देना चाहिए। अदालत ने कहा कि पुराने श्रमिकों की अनदेखी कर नए लोगों को भर्ती करना सही नहीं है।
जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस एस वी एन भट्टी की पीठ ने कहा कि यह प्राथमिकता केवल कागजों तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि इसका वास्तविक लाभ ठेका श्रमिकों को मिलना चाहिए। नियोक्ता उम्र सीमा और शैक्षणिक योग्यता में ढील दे सकते हैं, खासकर उन पदों पर जहां तकनीकी योग्यता की आवश्यकता नहीं है, जिससे अनुभवी श्रमिकों को नौकरी मिल सकेगी।
कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि यदि साबित हो जाए कि ठेका श्रम व्यवस्था केवल दिखावे के लिए है, और कंपनी सीधे श्रमिकों को नियंत्रित कर रही है, तो ऐसे मामलों में ठेका मान्य नहीं होगा। ऐसे श्रमिकों को कंपनी का कर्मचारी माना जाएगा और उन्हें नियमित कर्मचारियों के समान लाभ मिलेंगे।
हाईकोर्ट ने औद्योगिक न्यायालय के आदेश को सही ठहराया, जिसके बाद कंपनी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की। कोर्ट ने कहा कि औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 33(1) का लाभ तभी मिलेगी जब यह साबित हो कि संबंधित व्यक्ति वास्तव में कंपनी का श्रमिक है।
सुप्रीम कोर्ट ने औद्योगिक न्यायालय और हाईकोर्ट के पूर्व के आदेशों को रद्द करते हुए श्रमिकों को राहत दी कि वे दोबारा औद्योगिक न्यायालय जा सकते हैं और यह साबित कर सकते हैं कि ठेका व्यवस्था केवल दिखावा थी। यदि कंपनी नियमित भर्ती करती है, तो उन्हें पहले अवसर दिया जाना चाहिए।
स्रोत: सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी पर आधारित —
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