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रिपोर्ट: हिमांशु जोशी

नैनीताल. उत्तराखंड हाईकोर्ट (Uttarakhand High Court in Nainital) के नैनीताल शहर से शिफ्ट होने को लेकर काफी समय से चर्चा चल रही है. नवंबर के आखिरी हफ्ते में राज्‍य की पुष्कर सिंह धामी सरकार ने हाईकोर्ट को हल्द्वानी शिफ्ट करने को लेकर हरी झंडी दिखा दी. भले ही नैनीताल में हाईकोर्ट की स्थापना उत्तराखंड की स्थापना के बाद ही हुई हो, लेकिन इस भवन का निर्माण देश के आजाद होने से भी कई साल पहले हो गया था. वर्तमान में नैनीताल स्थित हाईकोर्ट काफी साल पुराना है. इसकी बुनियाद ब्रिटिशकाल में रखी गई थी.

इतिहासकर प्रोफेसर अजय रावत ने बताया कि साल 1862 से इस भवन के निर्माण की कवायद शुरू हो गई थी. उत्तर पश्चिमी प्रांत की ग्रीष्मकालीन राजधानी नैनीताल को बनाया गया था, जिस वजह से यहां सरकारी कामकाज निपटाने के लिए सचिवालय की जरूरत थी. शुरुआत में नैनीताल की माल रोड और फिर फ्लैट्स के नजदीक सचिवालय की स्थापना की गई. साल 1896 में इस सचिवालय शिफ्ट करने की घोषणा की गई. साल 1898 से 1900 तक एक भवन का निर्माण हुआ और साल 1900 से वर्तमान हाईकोर्ट भवन में सचिवालय की स्थापना हुई.

अजय रावत ने आगे बताया कि सचिवालय की स्थापना से पहले इस क्षेत्र को ‘बांसडेल एस्टेट’ के नाम से जाना जाता था. अंग्रेजों ने इस सचिवालय का निर्माण गौथिक शैली में कराया था और कला इतिहासकारों का मानना था यह भवन गौथिक शैली का सबसे सर्वोत्तम उदाहरण है. यहां चिनाई एशलर कला से की गई थी, जो एक यूरोपीयन कला है. इसमें सभी समान आकार के पत्थरों को एक के ऊपर एक रखकर मोरटार में उड़द की दाल और थोड़ा गुड़ मिलाकर आपस में चिपकाया जाता था. इस तरह का निर्माण भवन को भूकंपरोधी बनाता है. इस कला से इमारत में काफी मजबूती आती थी, जिस वजह से आज भी लगभग 122 साल के बाद यह भवन ज्यों का त्यों खड़ा है.

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देश के आजाद होने के बाद उत्तर पश्चिमी प्रांत जिसे बाद में उत्तर प्रदेश के नाम से जाना जाने लगा, उसकी ग्रीष्मकालीन राजधानी नैनीताल ही थी. जिस वजह से सचिवालय के सारे काम यहीं हुआ करते थे. हालांकि साल 2000 में उत्तराखंड की स्थापना के बाद देहरादून को राज्य की राजधानी बनाया गया. इसके बाद राज्य में हाईकोर्ट बनने की बातें चर्चा में आने लगीं. साल 2000 में तब के केंद्रीय कानून मंत्री अरुण जेटली ने नैनीताल आकर यहां हाईकोर्ट के बनाए जाने की घोषणा कर दी. जेटली का नैनीताल से बचपन का नाता भी रहा था.

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