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ब्रिटेन से भारत लौटेगी जैन समुदाय की 2000 साल पुरानी विरासत: दुर्लभ पांडुलिपियां लौटाएगा विक्टोरिया एंड अल्बर्ट संग्रहालय
17/5/2026, 1:38:55 am

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**लंदन:** ब्रिटेन के विक्टोरिया एंड अल्बर्ट (वी एंड ए) संग्रहालय ने जैन समुदाय के लिए एक ऐतिहासिक घोषणा की है। संग्रहालय 2000 से अधिक दुर्लभ और प्राचीन जैन पांडुलिपियों को भारत में जैन समुदाय को लौटाएगा। यह फैसला जैन धर्म की समृद्ध सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत को संरक्षित करने और उसे उसके मूल स्थान पर लौटाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
ये पांडुलिपियां सदियों पुरानी हैं और इनमें जैन आगम, दार्शनिक ग्रंथ, कथाएं और चित्रकला का अनूठा संगम देखने को मिलता है। कई पांडुलिपियों में उन ज्ञान को संजोया गया है जो समय के साथ लुप्त होने के कगार पर थे। इनके वापस लौटने से शोधकर्ताओं, विद्वानों और आम जैन अनुयायियों को अपनी विरासत को गहराई से समझने का अवसर मिलेगा।
यह महत्वपूर्ण कदम लंदन स्थित 'इंस्टीट्यूट ऑफ जैनोलॉजी' के प्रयासों का परिणाम है। संस्थान ने इन पांडुलिपियों को भारत को वापस दिलवाने के लिए लंबे समय से प्रयास किए। संग्रहालय के प्रतिनिधियों ने भी इस पहल का स्वागत किया है और इसे सांस्कृतिक आदान-प्रदान के रूप में देखा है। वी एंड ए संग्रहालय, जो दुनिया के सबसे बड़े कला और डिजाइन संग्रहालयों में से एक है, ने माना है कि ये पांडुलिपियां जैन समुदाय की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का अटूट हिस्सा हैं।
पांडुलिपियों का स्वरूप अत्यंत विविधतापूर्ण है। इनमें चमड़े, ताड़ के पत्ते और कागज पर लिखी गई रचनाएं शामिल हैं, जिन पर सुंदर चित्रकारी की गई है। ये कलाकृतियां न केवल धार्मिक महत्व रखती हैं, बल्कि उस समय के भारतीय समाज, संस्कृति, भाषा और कला के बारे में भी बहुमूल्य जानकारी प्रदान करती हैं। इनका अध्ययन प्राचीन भारत के सामाजिक-आर्थिक जीवन को समझने में भी सहायक होगा।
इस फैसले का भारत में जैन समुदाय द्वारा गर्मजोशी से स्वागत किया गया है। समुदाय के सदस्यों का मानना है कि यह न केवल उनकी खोई हुई विरासत की वापसी है, बल्कि यह दर्शाता है कि दुनिया भर के संग्रहालय अब सांस्कृतिक धरोहरों को उनके मूल देशों को लौटाने के प्रति अधिक संवेदनशील हो रहे हैं। इससे भविष्य में भी ऐसे कई ऐतिहासिक आदान-प्रदान की उम्मीद जगी है, जो भारत की अनमोल सांस्कृतिक संपदा को संरक्षित करने और उसे पुनर्जीवित करने में मदद करेंगे।
लौटाई जाने वाली पांडुलिपियों को कैसे संरक्षित और प्रदर्शित किया जाएगा, इस पर काम शुरू हो गया है। भारत में जल्द ही इन दुर्लभ रत्नों को देखने का अवसर मिलेगा, जो आने वाली पीढ़ियों को अपनी गौरवशाली विरासत से जोड़ेंगे।
समाचार स्रोत: अमर उजाला — विश्व
समाचार स्रोत: अमर उजाला — विश्व
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