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केन-बेतवा लिंक परियोजना: विस्थापन और मुआवजे पर ग्रामीणों का प्रबल विरोध, नारा- 'हम मर जाएंगे, भागेंगे नहीं'

14/5/2026, 1:34:51 pm
केन-बेतवा लिंक परियोजना: विस्थापन और मुआवजे पर ग्रामीणों का प्रबल विरोध, नारा- 'हम मर जाएंगे, भागेंगे नहीं'
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भारत सरकार की बहुप्रतीक्षित केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना अब स्थानीय विरोध के केंद्र में आ गई है। परियोजना स्थल पर मुआवजे और पुनर्वास को लेकर ग्रामीण आमने-सामने आ गए हैं, और उनका एक ही स्पष्ट संदेश है: 'हम मर जाएंगे लेकिन भागेंगे नहीं'। यह नारा उनके दृढ़ संकल्प को दर्शाता है कि वे अपनी पुश्तैनी ज़मीन और घर छोड़ने को तैयार नहीं हैं, जब तक कि उनकी सभी चिंताओं का पूरी तरह समाधान नहीं हो जाता। हालिया घटनाक्रमों में, प्रशासन द्वारा कथित तौर पर ग्रामीणों के घरों को गिराने का प्रयास किया गया है, जिसने स्थिति को और तनावपूर्ण बना दिया है। ग्रामीणों का आरोप है कि प्रशासन बिना किसी ठोस मुआवजे और पुनर्वास योजना के इस तरह का कदम उठा रहा है। उनका कहना है कि उन्हें न तो उचित मुआवजा मिला है और न ही रहने के लिए वैकल्पिक जगह उपलब्ध कराई गई है, ऐसे में वे कहां जाएंगे और कैसे गुजारा करेंगे? केन-बेतवा लिंक परियोजना का मुख्य उद्देश्य पानी की कमी से जूझ रहे बुंदेलखंड क्षेत्र को जल संकट से मुक्ति दिलाना है। इस विशाल परियोजना में केन नदी के पानी को बेतवा नदी में मोड़कर सिंचाई और पेयजल के लिए उपलब्ध कराना शामिल है। हालांकि, इस विकास की कीमत स्थानीय लोगों को अपने घरों और आजीविका के साधनों से विस्थापित होने के रूप में चुकानी पड़ रही है। अनुमान है कि यह परियोजना हजारों लोगों को प्रभावित करेगी और बड़ी संख्या में भूमि को जलमग्न करेगी। ग्रामवासियों का कहना है कि प्रशासन ने पहले उन्हें आश्वासन दिया था कि बिना पूर्ण और संतोषजनक समाधान के कोई भी कार्रवाई नहीं की जाएगी। लेकिन अब, उन्हें लगता है कि उनके वादों को तोड़ा जा रहा है। वे अपनी मांगों को लेकर एकजुट हैं और चेतावनी दे रहे हैं कि वे किसी भी कीमत पर अपनी ज़मीन नहीं छोड़ेंगे। प्रदर्शनकारी ग्रामीण सड़कों पर उतरकर अपनी आवाज़ बुलंद कर रहे हैं और सरकार से मानवीय दृष्टिकोण अपनाने की अपील कर रहे हैं। विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों ने भी इस परियोजना के सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभावों पर चिंता व्यक्त की है। उनका मानना है कि विकास के नाम पर किए जा रहे ऐसे बड़े निर्माण कार्यों को स्थानीय समुदायों की सहमति और उचित पुनर्वास के बिना आगे बढ़ाना एक बड़ी गलती हो सकती है। सरकार को इन विरोध प्रदर्शनों को गंभीरता से लेना चाहिए और एक मध्यस्थता मार्ग खोजना चाहिए जो विकास और मानव अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित कर सके। केवल तभी यह परियोजना अपने उद्देश्य में सफल हो पाएगी और राष्ट्र के लिए वास्तव में उपयोगी सिद्ध होगी। समाचार स्रोत: BBC हिंदी — दुनिया
समाचार स्रोत: BBC हिंदी — दुनिया

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