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बिहार में बाढ़ का कहर: कुदरत की मार या सिस्टम की नाकामी?

11/9/2026, 3:14:17 am
बिहार में बाढ़ का कहर: कुदरत की मार या सिस्टम की नाकामी?
बिहार के उत्तरी जिलों में मानसून आते ही नदियाँ उफान पर होती हैं। कोसी, गंडक, बागमती और महानंदा हर साल तटबंध तोड़कर सैकड़ों गांव डुबो देती हैं। इस बार भी सीतामढ़ी, मधुबनी, अररिया और किशनगंज में पानी खेतों से होता हुआ घरों तक पहुँच गया। लाखों लोग ऊँचे स्थानों, सड़कों और राहत शिविरों में शरण लिए हुए हैं। सरकारी आँकड़ों के मुताबिक इस सीजन में अब तक 40 लाख से अधिक आबादी प्रभावित हुई है। फसलें पूरी तरह बर्बाद हो चुकी हैं और किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। पशुओं के चारे का संकट गहरा गया है। पीने का साफ पानी नहीं मिल रहा, जिससे डायरिया और चर्म रोग तेजी से फैलने लगे हैं। राहत कार्य में एनडीआरएफ और एसडीआरएफ की टीमें लगी हैं, लेकिन नावों की कमी और टूटी सड़कों के कारण दूरदराज के गांवों तक पहुँचना मुश्किल हो रहा है। कई जगहों पर हेलीकॉप्टर से खाना गिराया जा रहा है, पर यह ऊँट के मुँह में जीरा साबित हो रहा है। विशेषज्ञ मानते हैं कि बाढ़ प्राकृतिक आपदा है, लेकिन इसकी विभीषिका बढ़ाने में मानवीय चूक बड़ी भूमिका निभाती है। तटबंधों की मरम्मत समय पर नहीं होती और नदियों की गाद निकालने का काम बरसों से लंबित है। जल निकासी के पुराने रास्ते अतिक्रमण का शिकार हो चुके हैं। स्थानीय लोग आरोप लगाते हैं कि हर साल बाढ़ राहत के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च होते हैं, फिर भी हालात जस के तस रहते हैं। भ्रष्टाचार और ठेकेदारी प्रथा ने तटबंध निर्माण को कमजोर कर दिया है। मुख्यमंत्री ने हाल ही में बाढ़ प्रभावित इलाकों का हवाई सर्वे किया और अधिकारियों को त्वरित कार्रवाई के निर्देश दिए। केंद्र सरकार ने भी अतिरिक्त सहायता राशि जारी की है। लेकिन ज़मीन पर हालात बदलने के लिए दीर्घकालिक योजना और ईमानदार क्रियान्वयन जरूरी है। बिहार की जनता हर साल यही सवाल पूछती है: क्या हम कभी बाढ़ से स्थायी निजात पा सकेंगे? उत्तर तभी मिलेगा जब कागजी योजनाएँ धरातल पर उतरेंगी। समाचार स्रोत: Google News — Bihar (Hindi)
समाचार स्रोत: Google News — Bihar (Hindi)

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