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ब्रिक्स शिखर सम्मेलन: बड़े नेताओं की मौजूदगी के बावजूद भारत के लिए चुनौतियां बरकरार

12/9/2026, 1:40:42 am
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन: बड़े नेताओं की मौजूदगी के बावजूद भारत के लिए चुनौतियां बरकरार
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रूस के कज़ान में चल रहे ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन समेत कई बड़े नेता मौजूद हैं। सम्मेलन का एजेंडा वैश्विक दक्षिण की एकजुटता, डॉलर के विकल्प तलाशना और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था को मजबूत करना है। लेकिन भारत के लिए असली परीक्षा सम्मेलन कक्ष के बाहर है। पिछले कुछ महीनों में मध्य-पूर्व के घटनाक्रम तेजी से बदले हैं। ईरान और इस्राइल के बीच तनाव चरम पर पहुंचा तो पाकिस्तान ने खुद को सक्रिय मध्यस्थ के तौर पर पेश किया। इस्लामाबाद ने तेहरान और अन्य क्षेत्रीय राजधानियों के चक्कर लगाए, जिसकी चर्चा अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक गलियारों में रही। जानकार मानते हैं कि इससे पाकिस्तान को एक ऐसे मंच पर प्रासंगिकता मिली जहां भारत पारंपरिक रूप से मजबूत रहा है। भारत के पश्चिम एशिया से गहरे ऊर्जा, व्यापार और प्रवासी हित जुड़े हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने खाड़ी देशों के साथ संबंधों को नई ऊंचाई दी है। लेकिन पाकिस्तान की नई कूटनीतिक गतिविधि ने नई जटिलता पैदा की है। ईरान के साथ भारत के पुराने संबंध हैं, चाबहार बंदरगाह परियोजना रणनीतिक रूप से अहम है। अगर क्षेत्रीय संतुलन पाकिस्तान के पक्ष में झुकता है तो भारत के हित प्रभावित हो सकते हैं। ब्रिक्स में ईरान, मिस्र, इथियोपिया और संयुक्त अरब अमीरात नए सदस्य के तौर पर शामिल हुए हैं। यह समूह का विस्तार है, लेकिन सदस्यों के आपसी मतभेद भी हैं। भारत को अपनी विदेश नीति में संतुलन साधना होगा — रूस और चीन के साथ काम करते हुए पश्चिम के साथ संबंध बनाए रखना, और मध्य-पूर्व में अपने पारंपरिक प्रभाव क्षेत्र को बचाए रखना। विश्लेषकों का कहना है कि ब्रिक्स मंच भारत को अपनी बात रखने का अवसर देता है, लेकिन जमीनी हकीकत सम्मेलन घोषणापत्रों से तय नहीं होती। पाकिस्तान की मध्य-पूर्व में बढ़ती दखलअंदाजी एक ऐसी हकीकत है जिसे भारत नजरअंदाज नहीं कर सकता। आने वाले महीनों में नई दिल्ली की कूटनीतिक चपलता की असली परीक्षा होगी।
समाचार स्रोत: BBC हिंदी — दुनिया

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