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फरक्का जल संधि में बिहार के हितों की अनदेखी: विशेषज्ञों की चेतावनी

12/9/2026, 12:00:00 am
फरक्का जल संधि में बिहार के हितों की अनदेखी: विशेषज्ञों की चेतावनी
फरक्का जल संधि में बिहार के हितों की अनदेखी करने का आरोप लगाते हुए विशेषज्ञों ने कहा कि इस समझौते में राज्य की जल आवश्यकताओं को पर्याप्त weightage नहीं दिया गया है। 1975 में भारत और बांग्लादेश के बीच हस्ताक्षरित इस संधि का मुख्य उद्देश्य गंगा न้ำ के विभाजन को नियंत्रित करना था, लेकिन इसके प्रावधानों में बिहार के północी जिलों की पीने की पानी और सिंचाई की जरूरतों को कमतर बताया गया है। विशेषकर उत्तर बिहार के जिलों जैसे दरभंगा, मधुबनी और सुपौल में Groundwater स्तर लगातार गिर रहा है, जबकि superficie जल की उपलब्धता सीमित रहती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि संधि की समीक्षा नहीं की गई तो भविष्य में सूखे की स्थिति और गंभीर हो सकती है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, बिहार की कुल सिंचित भूमि का लगभग ४० प्रतिशत हिस्सा गंगा की सहायक नदियों पर निर्भर है। फरक्का बैराज से छोड़े जाने वाले पानी की मात्रा सीमित रखने से इन नदियों के प्रवाह में कमी आती है, जिससे खरीफ और रबी दोनों फसलों की पैदावार प्रभावित होती है। किसान संगठनों ने इस मुद्दे पर बार‑बार विरोध प्रदर्शन किए हैं और मांग की है कि संधि में बिहार को equitable share सुनिश्चित करने के लिए एक 별도 प्रावधान जोड़ा जाए। विशेषकर जलवायु परिवर्तन के कारण मानसून की अनिश्चितता बढ़ रही है, ऐसे में नदी जल के विश्वसनीय स्रोत का महत्व और भी बढ़ गया है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि संधि की मौजूदा शर्तों को पुनः देखते हुए एक संयुक्त समिति गठित की जाए, जिसमें बिहार के प्रतिनिधि भी शामिल हों। इस समिति का काम होगा कि गंगा के जल भंडारण, बैराज के संचालन और downstream राज्यों की पानी की मांग के बीच संतुलन बनाया जा सके। राजनीतिक दलों ने भी इस मुद्दे को अपने चुनावी घोषणा पत्र में जगह देना शुरू कर दिया है। कुछ नेता कहते हैं कि यदि बihar के पानी के हितों की रक्षा नहीं की गई तो आंदोलन का रूप ले सकता है। हालांकि केंद्र सरकार का कहना है कि मौजूदा संधि दोनों देशों के बीच शांति बनाए रखने में सफल रही है और कोई तत्काल बदलाव की योजना नहीं है। समाचार स्रोत: Google News — Bihar (Hindi)
समाचार स्रोत: Google News — Bihar (Hindi)

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