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जेन ज़ी युवा शराब छोड़ एंग्ज़ाइटी की दवाओं पर भरोसा कर रहे हैं

18/8/2026, 12:54:11 pm
जेन ज़ी युवा शराब छोड़ एंग्ज़ाइटी की दवाओं पर भरोसा कर रहे हैं
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जेन ज़ी के युवा अब शराब की जगह एंग्ज़ाइटी कम करने वाली दवाओं का सहारा ले रहे हैं। हाल के अंतरराष्ट्रीय सर्वे बताते हैं कि 18 से 25 साल के लोगों में सामाजिक चिंता की दर पिछले पांच साल में दोगुनी हो गई है। कई देशों के शोधकर्ताओं ने पाया कि युवा पार्टी, परीक्षा या नौकरी के दबाव में शराब पीने के बजाय बिना डॉक्टरी सलाह के एंटीडिप्रेसेंट या बेंजोडायजेपाइन जैसी दवाएं खरीद लेते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक 2023 में लगभग 30 प्रतिशत युवाओं ने किसी न किसी रूप में चिंता की शिकायत दर्ज कराई। भारत, अमेरिका और ब्रिटेन जैसे बड़े बाजारों में ऑनलाइन फार्मेसी के जरिए ये दवाएं आसानी से मिल जाती हैं। इससे युवा खुद ही डोज तय करते हैं और नियमित जांच नहीं कराते। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि सोशल मीडिया पर परफेक्ट लाइफ दिखाने का दबाव, महामारी के बाद की अनिश्चितता और आर्थिक तंगी मुख्य वजह हैं। युवा दोस्तों के साथ बातचीत में भी अपनी घबराहट छुपाने के लिए दवा का सहारा लेते हैं। उन्हें लगता है कि दवा तुरंत राहत देगी, जबकि शराब का असर देर से आता है। लेकिन विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि बिना निगरानी के ये दवाएं लत लगा सकती हैं। लंबे समय तक उपयोग से नींद की समस्या, याददाश्त में कमी और दिल की धड़कन बढ़ने जैसे दुष्प्रभाव सामने आते हैं। कई युवा बाद में डॉक्टर के पास जाते हैं जब लत गंभीर हो चुकी होती है। डॉक्टर सलाह देते हैं कि चिंता से निपटने के लिए काउंसलिंग, नियमित व्यायाम, ध्यान और संतुलित आहार ज्यादा कारगर हैं। अगर दवा जरूरी हो तो केवल पंजीकृत चिकित्सक की देखरेख में ली जाए। समाज को भी युवाओं की मानसिक सेहत पर खुलकर बात करनी होगी। भारत सरकार ने हाल ही में राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम का विस्तार किया है ताकि ग्रामीण इलाकों में भी काउंसलिंग केंद्र खोले जा सकें। कई राज्य सरकारों ने स्कूल और कॉलेज में मानसिक स्वास्थ्य पाठ्यक्रम अनिवार्य किया है। इससे युवाओं को जल्दी सहायता मिल सकेगी और वे खुद दवा खरीदने की बजाय विशेषज्ञ से सलाह लेंगे। युवा खुद भी सोशल मीडिया पर अपने अनुभव साझा कर रहे हैं और एक-दूसरे को प्रोत्साहित कर रहे हैं कि वे चिंता को छुपाएं नहीं। ऑनलाइन समूहों में चर्चा से पता चलता है कि कई लोग अब योग, मेडिटेशन और दोस्तों के साथ खुलकर बात करने को प्राथमिकता दे रहे हैं। यह बदलाव लंबे समय में दवा पर निर्भरता कम कर सकता है। समाचार स्रोत: BBC हिंदी — दुनिया
समाचार स्रोत: BBC हिंदी — दुनिया

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