विश्व
होर्मुज़ में तनाव और हूती हमले: भारत के तेल आयात पर गहरा असर
9/9/2026, 7:29:47 am

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होर्मुज़ जलडमरूमध्य में अमेरिकी नौसेना और ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड के बीच फिर तनाव बढ़ गया है। साथ ही यमन के हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के तेल संयंत्रों पर मिसाइल दागे हैं।
इन दोनों घटनाओं से कच्चे तेल की कीमतें उछल सकती हैं। भारत अपनी ज़रूरत का लगभग 90 फ़ीसदी तेल आयात करता है, इसलिए किसी भी भाव बढ़ने का सीधा असर विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ता है।
पिछले कुछ महीनों में ब्रेंट क्रूड 80 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बना हुआ है। अगर होर्मुज़ में नौसैनिक टकराव लंबा खिंचा या हूती हमले जारी रहे, तो कीमत 90 डॉलर पार कर सकती है।
अधिक डॉलर खर्च करने का मतलब है कि भारत को अपने चालू खाता घाटे को काबू में रखने के लिए अधिक विदेशी मुद्रा जुटानी होगी। इससे रुपये पर दबाव बढ़ सकता है और महंगाई भी चढ़ सकती है।
सरकार पहले ही तेल आयात बिल कम करने के लिए रणनीतिक भंडार बढ़ा रही है और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों पर जोर दे रही है। लेकिन तात्कालिक झटके से निपटने के लिए त्वरित कदम जरूरी हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत को खाड़ी देशों के साथ कूटनीतिक बातचीत तेज़ करनी चाहिए और अंतरराष्ट्रीय मंच पर तेल बाज़ार की स्थिरता के लिए दबाव बनाना चाहिए।
फिलहाल बाज़ार की नज़र होर्मुज़ और लाल सागर के घटनाक्रम पर टिकी है। किसी भी अप्रत्याशित घटना से तेल की कीमतें तेज़ी से बदल सकती हैं, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था को फिर से झटका लग सकता है।
ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण उसकी तेल निर्यात पहले ही सीमित है। होर्मुज़ में टकराव से ईरान की ओर से तेल सप्लाई और भी अनिश्चित हो सकती है।
हूती हमले सऊदी अरब के बड़े रिफाइनरी और पाइपलाइन को निशाना बना रहे हैं। इससे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव बढ़ता है और बाज़ार में अनिश्चितता फैलती है।
भारत के पास अभी करीब 5.5 मिलियन बैरल का रणनीतिक भंडार है, जो केवल कुछ हफ्तों की ज़रूरत पूरी कर सकता है। लंबे संकट में यह भंडार तेज़ी से खत्म हो सकता है।
वित्त मंत्रालय ने हाल ही में तेल आयात बिल को कम करने के लिए घरेलू उत्पादन बढ़ाने और गैस आधारित बिजली संयंत्रों को प्रोत्साहन देने की योजना घोषित की है। लेकिन इन उपायों का असर मध्यम अवधि में दिखेगा।
तब तक भारत को अंतरराष्ट्रीय बाज़ार की अस्थिरता से बचने के लिए हेजिंग उपकरणों का इस्तेमाल बढ़ाना पड़ सकता है। इससे कंपनियों की लागत बढ़ेगी और अंततः उपभोक्ता पर असर पड़ेगा।
समाचार स्रोत: BBC हिंदी — दुनिया
समाचार स्रोत: BBC हिंदी — दुनिया
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