लाइव
टाइम्स न्यूज़ नाउ में आपका स्वागत है — सिर्फ सच।ऑटो-पब्लिशिंग इंजन तैयार है। एडमिन → ऑटोमैटिक से कॉन्फ़िगर करें।टाइम्स न्यूज़ नाउ में आपका स्वागत है — सिर्फ सच।ऑटो-पब्लिशिंग इंजन तैयार है। एडमिन → ऑटोमैटिक से कॉन्फ़िगर करें।
भारत

नेपाल बाढ़: पर्यावरणविद् की चेतावनी – हिमालय के खतरे समझें, टिकाऊ विकास ज़रूरी

31/8/2026, 6:53:17 am
नेपाल बाढ़: पर्यावरणविद् की चेतावनी – हिमालय के खतरे समझें, टिकाऊ विकास ज़रूरी
Original publisher image
नेपाल में पिछले सप्ताह आई भारी बाढ़ ने काठमांडू घाटी और तराई के कई जिलों को पानी में डुबो दिया। नदियों का जलस्तर अचानक बढ़ने से सैकड़ों घर बह गए और हजारों लोग बेघर हो गए। पर्यावरणविद् डॉ. रमेश शर्मा ने इस घटना को हिमालय के बढ़ते खतरे का स्पष्ट संकेत बताया। उन्होंने कहा कि ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने और अनियमित वर्षा ने नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को बिगाड़ दिया है। डॉ. शर्मा ने जोर देकर कहा कि जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ अनियोजित शहरीकरण और सड़क निर्माण ने मिट्टी की कटाई को बढ़ावा दिया है। इससे भूस्खलन और अचानक बाढ़ की आशंका कई गुना बढ़ गई है। उन्होंने टिकाऊ विकास की अवधारणा को अपनाने की मांग की। उनके अनुसार, विकास योजनाओं में पर्यावरण प्रभाव आकलन अनिवार्य होना चाहिए और नदियों के किनारे बसे गांवों के लिए सुरक्षित जल निकासी प्रणाली बनाई जानी चाहिए। स्थानीय समुदायों को जागरूक करने के लिए डॉ. शर्मा ने ग्राम सभाओं और स्कूलों में जल संरक्षण कार्यशालाएं आयोजित करने का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि वर्षा जल संचय और वनरोपण से मिट्टी की नमी बनी रहती है। सरकार से उन्होंने अपील की कि बाढ़ पूर्वानुमान के लिए उपग्रह आधारित निगरानी और वास्तविक समय डेटा साझा करने की व्यवस्था की जाए। वैज्ञानिक आंकड़ों के आधार पर ही राहत और पुनर्वास कार्यक्रम तैयार हों। विशेषज्ञों का मानना है कि हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर पिघलने से नदियों में पानी का स्तर तेजी से बढ़ रहा है। इससे न केवल नेपाल बल्कि भारत के उत्तराखंड, बिहार और पश्चिम बंगाल भी प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए दीर्घकालिक नीतियों में जलवायु अनुकूलन, पारिस्थितिक संतुलन और समुदाय आधारित आपदा प्रबंधन को प्राथमिकता देनी होगी। नेपाल की इस घटना ने पूरे दक्षिण एशिया को सतर्क किया है कि प्रकृति के साथ तालमेल जरूरी है। अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने भी नेपाल को तकनीकी सहायता और वित्तीय सहायता देने की घोषणा की है। विश्व बैंक और एशियाई विकास बैंक ने बाढ़ जोखिम मानचित्रण और बुनियादी ढांचे के पुनर्निर्माण के लिए कर्ज मंजूर किए हैं। भारत ने भी सीमा पार सहयोग बढ़ाने का आश्वासन दिया है। दोनों देशों के मौसम विभाग अब संयुक्त रूप से नदी जलस्तर की निगरानी करेंगे और पूर्व चेतावनी प्रणाली को मजबूत करेंगे। पर्यावरणविदों का कहना है कि केवल आपातकालीन प्रतिक्रिया पर्याप्त नहीं है। लंबे समय तक हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र को बचाने के लिए कार्बन उत्सर्जन में कटौती और वन संरक्षण को राष्ट्रीय नीति का हिस्सा बनाना होगा। अंत में, डॉ. शर्मा ने नागरिकों से अपील की कि वे अपने दैनिक जीवन में प्लास्टिक का उपयोग कम करें, पानी बचाएं और स्थानीय वन विभाग के साथ मिलकर वृक्षारोपण अभियान में भाग लें। समाचार स्रोत: अमर उजाला — भारत
समाचार स्रोत: अमर उजाला — भारत

संबंधित