भारत
एनएसओ जिला डेटा: महिला रोजगार में भारी अंतर
18/9/2026, 11:30:36 pm

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राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) ने हाल ही में जिला स्तर पर श्रम बाजार के विस्तृत आंकड़े जारी किए हैं। इन आंकड़ों से पता चलता है कि देश भर में महिला कामकाजी हिस्सेदारी में कितना बड़ा अंतर है। रिपोर्ट में 2023‑24 के वार्षिक सर्वेक्षण के आधार पर 700 से अधिक जिलों के आंकड़े शामिल हैं।
कुछ जिलों में दस में से आठ महिलाएं किसी न किसी रूप में रोजगार से जुड़ी हुई हैं, जबकि कई अन्य जिलों में पांच में से एक महिला भी कामकाजी नहीं है। यह फर्क शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के साथ‑साथ राज्यों के बीच भी स्पष्ट दिखता है। शहरी जिलों में महिला कामकाजी दर औसतन 45 प्रतिशत के आसपास है, जबकि ग्रामीण जिलों में यह 15 प्रतिशत से भी कम रह जाती है।
उत्तर प्रदेश के पूर्वी जिले, बिहार के कई ग्रामीण ब्लॉक और मध्य प्रदेश के कुछ पिछड़े क्षेत्र सबसे निचले पायदान पर हैं। पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना और ओडिशा के कोरापुट जैसे जिले भी निचले समूह में आते हैं। इसके विपरीत केरल के एर्नाकुलम, तमिलनाडु के कोयंबटूर और हिमाचल प्रदेश के शिमला जैसे जिले शीर्ष पर हैं।
आंकड़ों के विश्लेषण से सामने आया है कि जहां महिला साक्षरता दर अधिक है, स्वास्थ्य सेवाएं सुलभ हैं और स्थानीय स्तर पर छोटे‑मझोले उद्योग मौजूद हैं, वहां महिला श्रम बल की भागीदारी स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती है। इसके अलावा, जहां महिला स्वयं सहायता समूह सक्रिय हैं, वहां रोजगार की संभावनाएं बढ़ी हैं।
केंद्र सरकार ने महिला उद्यमिता, कौशल विकास और मातृत्व लाभ जैसी कई योजनाएं शुरू की हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर इनका असर अलग‑अलग राज्यों में भिन्न है। कई जिलों में योजनाओं की जानकारी ही नहीं पहुंच पाती। राज्य सरकारों ने भी अपने स्तर पर महिला रोजगार मेले और प्रशिक्षण केंद्र स्थापित किए हैं, परन्तु निगरानी तंत्र कमजोर है।
सामाजिक मानदंड, पारिवारिक जिम्मेदारियां और सुरक्षित परिवहन की कमी भी महिलाओं को काम से दूर रखती हैं। ग्रामीण इलाकों में खेती‑बाड़ी के अलावा अन्य रोजगार विकल्प सीमित हैं। सुरक्षित सार्वजनिक परिवहन की कमी के कारण कई महिलाएं दूर स्थित कारखानों या सेवा केंद्रों तक नहीं पहुंच पातीं।
विशेषज्ञों का मानना है कि नीति निर्माण में जिला स्तरीय डेटा का नियमित उपयोग जरूरी है। डेटा‑ड्रिवन दृष्टिकोण से योजनाओं की प्रगति की वास्तविक समय पर निगरानी संभव होगी। इससे लक्षित हस्तक्षेप डिजाइन किए जा सकते हैं और संसाधनों का बेहतर आवंटन संभव होगा।
एनएसओ के ये आंकड़े नीति निर्माताओं, शोधकर्ताओं और नागरिक समाज के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ बन सकते हैं। आने वाले वर्षों में महिला श्रम बल की भागीदारी बढ़ाने के लिए ठोस कदम उठाने की जरूरत है। अगर जिला स्तरीय अंतर को पाटने के लिए समन्वित प्रयास किए जाएं, तो 2030 तक महिला श्रम बल की भागीदारी 50 प्रतिशत के लक्ष्य के करीब पहुंच सकती है।
समाचार स्रोत: अमर उजाला — भारत
समाचार स्रोत: अमर उजाला — भारत
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