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आसमान में कलाबाजी: सूर्य किरण के फाइटर पायलट्स की अनकही दास्तान

18/9/2026, 9:52:50 pm
आसमान में कलाबाजी: सूर्य किरण के फाइटर पायलट्स की अनकही दास्तान
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बेंगलुरु के येलहंका एयरबेस पर सुबह छह बजे से ही हलचल शुरू हो जाती है। हैंगर के बाहर नौ हॉक एजे-132 विमान कतार में खड़े हैं, उनके लाल-सफेद धड़ पर 'सूर्य किरण' लिखा चमक रहा है। यही वह टीम है जो आसमान को अपना कैनवास बनाकर कलाबाजी दिखाती है। स्क्वाड्रन लीडर रोहित शर्मा (काल्पनिक नाम) बताते हैं, "चयन के बाद असली इम्तिहान शुरू होता है। हर पायलट को 1500 घंटे उड़ान का तजुर्बा चाहिए, फिर छह महीने की कड़ी ट्रेनिंग। हम 300 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से उल्टे उड़ते हैं, विंगटिप टू विंगटिप — बस तीन मीटर का फासला।" ट्रेनिंग में सबसे पहले 'बॉक्स फॉर्मेशन' सिखाया जाता है। चार विमान एक वर्ग बनाकर उड़ते हैं, फिर लूप, रोल और स्प्लिट-एस जैसे करतब करते हैं। गलती की गुंजाइश शून्य। एक चूक, एक सेकंड की देरी — और दो विमान टकरा सकते हैं। "मानसिक तैयारी शारीरिक से ज्यादा जरूरी है," विंग कमांडर प्रिया मेहता (काल्पनिक नाम) कहती हैं। "हम 'सीट ऑफ पैंट्स' फीलिंग पर भरोसा करते हैं — इंस्ट्रूमेंट देखने का वक्त नहीं मिलता। शरीर बताता है कि विमान कहां जा रहा है।" जी-सूट पहनकर 9जी तक का बल झेलना पड़ता है। खून पैरों में जमा न हो, इसके लिए खास ब्रीदिंग तकनीक — 'एंटी-जी स्ट्रेनिंग मैन्यूवर' — हर रोज अभ्यास करते हैं। गर्दन की मांसपेशियां स्टील जैसी मजबूत होनी चाहिए। टीमवर्क का अंदाजा इस बात से लगाइए: लीडर इशारा करता है, बाकी आठ पायलट बिना रेडियो सुने ही मूवमेंट शुरू कर देते हैं। आंखों का संपर्क, हाथ के इशारे — यही भाषा है। "हम एक दिमाग की तरह सोचते हैं," फ्लाइट लेफ्टिनेंट अर्जुन सिंह (काल्पनिक नाम) मुस्कुराते हुए कहते हैं। एयर शो के दिन भीड़ की तालियां नहीं, अपने विमान का इंजन नोट सुनते हैं पायलट्स। धुआं छोड़ते हुए जब वे तिरंगा बनाते हैं, तब भी कॉकपिट में शांति रहती है। वही शांति उन्हें अगले करतब के लिए तैयार करती है। रिटायरमेंट के बाद भी कई पायलट्स यहीं रहकर नए रंगरूटों को सिखाते हैं। क्योंकि सूर्य किरण सिर्फ टीम नहीं, एक परंपरा है — जो आसमान को छूने का जुनून सिखाती है।
समाचार स्रोत: अमर उजाला — भारत

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