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क्यों नहीं मिली हिन्दी को राष्ट्रभाषा की जगह? 1949 का सच

14/9/2026, 12:14:07 pm
क्यों नहीं मिली हिन्दी को राष्ट्रभाषा की जगह? 1949 का सच
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14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने अनुच्छेद 343 से 351 तक के प्रावधान जोड़कर हिन्दी को देवनागरी लिपि में संघ की राजभाषा घोषित किया। इसे राष्ट्रभाषा नहीं बनाया गया क्योंकि कई सदस्यों ने आशंका जताई कि एक भाषा को विशेष दर्जा देने से अन्य क्षेत्रीय भाषाओं की उपेक्षा बढ़ सकती है। बहस में दक्षिण भारत के प्रतिनिधियों ने तेज़ आवाज़ उठाई। तमिलनाडु के सी. राजगोपालाचारी और कर्नाटक के एस. निजलिंगप्पा ने चेतावनी दी कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने से गैर‑हिन्दी भाषी राज्यों में असंतोष फैल सकता है। उनकी चिंता थी कि भाषा की प्रतिस्पर्धा राष्ट्रीय एकता को कमजोर कर देगी। इन आशंकाओं को सुनकर संविधान सभा ने मुंशी‑अयंगार सूत्र को अपनाया। इस सूत्र के अनुसार हिन्दी राजभाषा रहेगी लेकिन अंग्रेज़ी को आधिकारिक कामकाज में पन्द्रह साल तक जारी रखने की अनुमति दी गई। इस दौरान राज्यों को अपनी क्षेत्रीय भाषाओं के विकास के लिए स्वतंत्रता दी गई। संसद ने बाद में 1963 की आधिकारिक भाषा अधिनियम पारित करके इस समझौते को कानूनी रूप दे दिया। अधिनियम ने साफ़ किया कि हिन्दी केंद्र सरकार के काम की प्राथमिक भाषा होगी, पर अंग्रेज़ी का उपयोग न्यायपालिका, संसद और अंतर‑राज्यीय संवाद में जारी रहेगा। इस निर्णय का असर आज भी दिखाई देता है। कई राज्यों में अपनी भाषा के प्रति गर्व बढ़ा है और हिन्दी सीखने पर जोर दिया जाता है, साथ ही हिन्दी बोलने वालों की संख्या भी लगातार बढ़ी है। भाषा नीति में बनाया गया संतुलन भारत की विविधता को बनाए रखने में मददगार साबित हुआ है। समाचार स्रोत: BBC हिंदी — दुनिया
समाचार स्रोत: BBC हिंदी — दुनिया

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