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देशभर में 891 छुआछूत के मामले लंबित, आधे उत्तर प्रदेश में, उत्तराखंड में एक भी नहीं

5/9/2026, 1:49:10 am
देशभर में 891 छुआछूत के मामले लंबित, आधे उत्तर प्रदेश में, उत्तराखंड में एक भी नहीं
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देशभर में छुआछूत के 891 मुकदमे अभी अदालतों में लंबित हैं। इनमें से करीब 445 मामले सिर्फ उत्तर प्रदेश से हैं, यानी लगभग आधे मामले एक ही राज्य में दर्ज हुए। उत्तराखंड में एक भी केस दर्ज नहीं मिला, जो आंकड़ों में एक बड़ा अंतर दिखाता है। ये मामले मुख्य रूप से नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम 1955 और एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 के तहत दर्ज हुए हैं। कानून में छुआछूत को अपराध माना गया है और दोषियों को सज़ा का प्रावधान है। फिर भी अदालतों में इतनी बड़ी संख्या दिखाती है कि न्याय पाना आसान नहीं है। मुख्य वजहों में अदालतों का बोझ, पीड़ितों में कानूनी जागरूकता की कमी और प्रक्रिया में देरी शामिल हैं। अक्सर पीड़ित सामाजिक दबाव के कारण शिकायत दर्ज कराने से हिचकिचाते हैं, जबकि पुलिस और प्रशासन की संवेदनशीलता में कमी जांच को धीमा कर देती है। सरकार ने कुछ कदम उठाए हैं, कई राज्यों में विशेष फास्ट‑ट्रैक अदालतें बनाई गई हैं ताकि ऐसे मामले जल्दी निपटें। पुलिस कर्मियों और राजस्व अधिकारियों को प्रशिक्षण देकर उन्हें सामाजिक अन्याय पहचानने लायक बनाया जा रहा है। गैर‑सरकारी संगठन भी पीड़ितों को कानूनी मदद मुहैया करा रहे हैं और जागरूकता अभियान चला रहे हैं। इन कोशिशों के बावजूद सवाल बना हुआ है कि क्या सज़ा का इंतज़ार खत्म होगा। अगर लंबित मामलों में तेजी नहीं आई तो सामाजिक विश्वास कमज़ोर होगा और कानून का मकसद अधूरा रह जाएगा। अब नीति‑निर्माता, न्यायपालिका और समाज को मिलकर ठोस कदम उठाने होंगे ताकि हर पीड़ित को समय पर न्याय मिल सके। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के ताजा आंकड़ों के मुताबिक पिछले तीन साल में छुआछूत के मामलों में 12 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है। सुप्रीम कोर्ट ने कई बार राज्यों को निर्देश दिया है कि लंबित मामलों की सुनवाई में प्राथमिकता दी जाए और पीड़ितों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। कई गैर‑सरकारी संगठनों ने मोबाइल ऐप लॉन्च किए हैं जिनसे पीड़ित घर बैठे शिकायत दर्ज करा सकते हैं और कानूनी सलाह ले सकते हैं। राज्य सरकारों ने पीड़ित परिवारों को आर्थिक सहायता और पुनर्वास योजना शुरू की है, लेकिन लाभार्थियों तक पहुंच अभी सीमित है। विशेषज्ञ मानते हैं कि सामाजिक जागरूकता के साथ‑साथ न्यायिक प्रक्रिया को सरल बनाना ही स्थायी समाधान हो सकता है। समाचार स्रोत: अमर उजाला — भारत
समाचार स्रोत: अमर उजाला — भारत

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