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समंदर के नीचे बिछी केबलें बूढ़ी हो रहीं, भारत का इंटरनेट कितना सुरक्षित?

12/9/2026, 10:39:22 am
समंदर के नीचे बिछी केबलें बूढ़ी हो रहीं, भारत का इंटरनेट कितना सुरक्षित?
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भारत में इंटरनेट का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। गांवों तक 4G और 5G पहुंच चुका है। यूपीआई, ओटीटी, ऑनलाइन शिक्षा सब इसी नेटवर्क पर निर्भर हैं। लेकिन एक कमजोर कड़ी है जिसके बारे में कम चर्चा होती है — समुद्र तल पर बिछी ऑप्टिकल फाइबर केबलें। दुनिया का 99 प्रतिशत अंतरराष्ट्रीय डेटा इन्हीं केबलों से गुजरता है। भारत के लिए ये जीवनरेखा हैं। मुंबई, चेन्नई, कोच्चि और त्रिवेंद्रम में ये केबलें तट से जुड़ती हैं। अकेले मुंबई 70 फीसदी ट्रैफिक संभालता है। अधिकांश केबलें 25 साल की डिजाइन आयु पूरी कर चुकी हैं या उसके करीब हैं। 2000 के दशक की शुरुआत में बिछी केबलें अब रिटायरमेंट की दहलीज पर हैं। नई केबल बिछाने में दो से तीन साल लगते हैं और लागत करोड़ों डॉलर में जाती है। मरम्मत के लिए विशेष जहाज चाहिए जो दुनिया में गिने-चुने हैं। खराबी आने पर हफ्तों इंतजार करना पड़ता है। 2022 में टोंगा ज्वालामुखी विस्फोट के बाद केबल टूटी तो देश कई हफ्तों तक दुनिया से कटा रहा। भू‑राजनीतिक तनाव भी खतरा बढ़ाते हैं। दक्षिण चीन सागर, लाल सागर और हिंद महासागर के रूट विवादित इलाकों से गुजरते हैं। भारत की अपनी कमजोरियां भी हैं। लैंडिंग स्टेशन कम हैं और मुंबई‑चेन्नई पर निर्भरता ज्यादा। सरकार ने नेशनल अंडरसी केबल पॉलिसी बनाई है। निजी कंपनियां नए रूट तलाश रही हैं। गूगल‑मेटा की इंडिया‑एशिया‑एक्सप्रेस और सीमवेव‑6 जैसी परियोजनाएं पाइपलाइन में हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल नई केबल काफी नहीं। विविधता चाहिए — अलग‑अलग रूट, अलग लैंडिंग पॉइंट, सैटेलाइट बैकअप। स्टारलिंक जैसी सेवाएं पूरक बन सकती हैं। जब तक ये उपाय पूरे नहीं होते, इंटरनेट बूम की नींव कमजोर रहेगी। समाचार स्रोत: BBC हिंदी — दुनिया
समाचार स्रोत: BBC हिंदी — दुनिया

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