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AI से जाति जनगणना आसान होगी? करोड़ों रिकॉर्ड का चुटकी में विश्लेषण

2/9/2026, 11:54:57 pm
AI से जाति जनगणना आसान होगी? करोड़ों रिकॉर्ड का चुटकी में विश्लेषण
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सरकार ने 2027 की जनगणना की तैयारियां तेज कर दी हैं। इस बार जाति आधारित आंकड़े जुटाने के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का इस्तेमाल करने की योजना बनाई जा रही है। उद्देश्य है कि लंबी प्रक्रिया को छोटा करके डेटा का विश्लेषण त्वरित रूप से किया जा सके। पिछली जनगणनाओं में जाति की गणना हाथों से की जाती थी, जिससे त्रुटियों की संभावना बढ़ जाती थी और समय बहुत लगता था। लाखों Forms को हाथ से पढ़कर डेटाबेस में डालना न केवल थकाऊ होता था बल्कि महंगा भी पड़ता था। इसीलिए नई तकनीक की तलाश जारी थी। विशेषज्ञों का मानना है कि मशीन लर्निंग मॉडल को बड़े सेट में प्रशिक्षित करके जाति संबंधी प्रश्नों के जवाब पहचानना संभव हो सकता है। स्कैन किए गए फॉर्म पर लिखे गए नाम और कोड को एल्गोरिदम पढ़कर स्वतः वर्गीकृत कर सकता है, जिससे मानवीय हस्तक्षेप कम होगा। कुछ राज्यों में पायलट परियोजनाएं चलाई गई हैं, जहाँ AI आधारित प्रणाली ने कुछ हफ़्तों में लाखों रिकॉर्ड्स को प्रोसेस कर दिया। इन परीक्षणों में सटीकता दर 95 प्रतिशत से अधिक पाई गई, जो पारंपरिक तरीके से बेहतर बताई जा रही है। यदि ये परिणाम nationwide स्तर पर दोहराए जा सकते हैं तो जनगणना कार्यालय को अंतिम रिपोर्ट तैयार करने में महीनों की बजाय केवल हफ्तों की जरूरत पड़ेगी। इससे नीति निर्माताओं को समय पर सही डेटा मिलेगा और योजनाओं में तेजी आएगी। लेकिन आलोचकों की चिंता भी जायज़ है। वे डरते हैं कि एल्गोरिदम में छिपी पूर्वाग्रहें विशेष जातियों को गलत तरीके से पहचान सकती हैं या डेटा लीक हो सकता है। इसलिए पारदर्शिता और नियमित ऑडिट की मांग उठ रही है। सरकार ने कहा है कि कोई भी AI मॉडल प्रयोग में लाने से पहले उसका स्वतंत्र मूल्यांकन किया जाएगा। डेटा सुरक्षा के लिए कड़े प्रोटोकॉल बनाए जाएंगे और केवल अधिकृत कर्मियों को ही जानकारी तक पहुंच होगी। अकादमिक जगत के सामाजिक वैज्ञानिक इस विकास को सावधानीपूर्वक स्वागत कर रहे हैं। उनका कहना है कि यदि तकनीक का उपयोग नैतिक दिशानिर्देशों के अनुसार किया जाए तो यह सामाजिक न्याय के लक्ष्यों को पूरा करने में मददगार साबित हो सकता है। कार्यान्वयन का समयरेखा अभी तय नहीं है पर विशेषज्ञों का मानना है कि 2026 के अंत तक प्रणाली तैयार हो जाएंगी और 2027 की जनगणना में उनका उपयोग शुरू हो सकता है। इस बीच प्रशिक्षण और जागरूकता अभियान चलाए जाएंगे। अंत में कहना होगा कि तकनीक और सामाजिक सर्वेक्षण का मेल नए अवसर ला रहा है। देखना होगा कि यह संयोजन कितना प्रभावी साबित होता है। समाचार स्रोत: अमर उजाला - भारत
समाचार स्रोत: अमर उजाला — भारत

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