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भारत

कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल के पार, तेल कंपनियों को भारी घाटा

9/9/2026, 11:15:03 pm
कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल के पार, तेल कंपनियों को भारी घाटा
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अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में पिछले कुछ सप्ताहों में तेजी आई है और ब्रेंट क्रूड की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गई है। इस उछाल के पीछे मुख्य कारण मध्य पूर्व में चल रहे भू‑राजनीतिक तनाव, ओपेक प्लस द्वारा उत्पादन में की गई कटौती, और चीन सहित प्रमुख उपभोक्ता देशों में ईंधन की मांग में सुधार हैं। तेल कीमतों में इस वृद्धि का सीधा असर देश की तेल विपणन कंपनियों – इंडियन ऑयल, भारीती पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम – पर पड़ रहा है, क्योंकि वे कच्चा तेल उच्च दर पर खरीद रही हैं लेकिन खुदरा कीमतों पर सरकार द्वारा लगाए गए टैक्स और सब्सिडी की नीति के कारण पूरी लागत ग्राहकों पर नहीं डाल पा रही हैं। नतीजतन, प्रति लीटर बिक्री पर मार्जिन सिकुड़ रहा है और कई कंपनियों को प्रत्येक लीटर पर पाँच से आठ रुपये का घाटा हो रहा है। वित्तीय रिपोर्ट्स में इस तिमाही में शुद्ध लाभ में ध्यान देने योग्य गिरावट दर्ज की गई है और विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि अगर कच्चा तेल की कीमत इस स्तर पर बनी रही तो पूरे वित्त वर्ष में नुकसान बढ़ सकता है। सरकार ने इस स्थिति को देखते हुए एक्साइज ड्यूटी में अस्थायी कटौती का संकेत दिया है, लेकिन राजकोषीय घाटा चिंता का विषय बना हुआ है क्योंकि इससे राजस्व पर असर पड़ेगा। उपभोक्ताओं को भी पेट्रोल‑डीजल की कीमत में धीरे‑धीरे बढ़ोतरी महसूस हो रही है, हालांकि कंपनियां नुकसान को सीमित करने के लिए मूल्य में केवल मामूली वृद्धि कर रही हैं। राज्य सरकारों को भी पेट्रोल और डीजल पर वैट से मिलने वाली आय में कमी का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि खुदरा कीमतों में वृद्धि सीमित होने से उपभोग में गिरावट आई है। इससे कई राज्यों के बजट में अंतर पैदा हो रहा है और वे विकास कार्यों की वित्तीय योजना में बदलाव कर रहे हैं। महँगाई के दबाव के कारण रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया ने मौद्रिक नीति पर सावधानी बरती है और आगे की ब्याज दर निर्णयों में ईंधन कीमतों को एक महत्वपूर्ण कारक मानकर चल रहा है। उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों पर भी ईंधन लागत का असर दिखाई दे रहा है, विशेषकर परिवहन और लॉजिस्टिक्स क्षेत्र में, जिससे आपूर्ति श्रृंखला में देरी और लागत बढ़ रही है। तेल कंपनियों ने अपने वित्तीय बयानों में कहा कि वे लागत को कम करने के लिए रिफाइनरी की कार्य क्षमता को अनुकूलित कर रही हैं और ऊर्जा‑कुशल प्रौद्योगिकियों में निवेश बढ़ा रही हैं। कुछ कंपनियों ने हाइड्रोजन और सोलर‑आधारित ऊर्जा परियोजनाओं में भागीदारी बढ़ाने की योजना बनाई है ताकि लंबी अवधि में fossil‑based ईंधन पर निर्भरता कम हो सके। विश्लेषकों का मानना है कि अगर अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतें 100 डॉलर के स्तर पर टिकी रहती हैं तो तेल क्षेत्र में रेकॉर्ड‑तोड़ निवेश योजनाओं को पुनः評価 करना पड़ सकता है। उपभोक्ता संरक्षण संगठनों ने सरकार से अपील की है कि वह पारदर्शी मूल्य निर्धारण तंत्र बनाए रखे और कर संरचना को इस तरह से समायोजित करे कि उपभोक्ताओं पर अचानक बोझ न पड़े। कुल मिलाकर, वर्तमान परिदृश्य में तेल कंपनियों, नीति निर्माताओं और उपभोक्ताओं तीनों के बीच संतुलन बनाना एक चुनौतीपूर्ण कार्य बन गया है। समाचार स्रोत: अमर उजाला — भारत
समाचार स्रोत: अमर उजाला — भारत

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