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पैसों के फैसले में डर क्यों हावी? सर्वे ने बताया मनोविज्ञान

21/8/2026, 4:01:41 pm
पैसों के फैसले में डर क्यों हावी? सर्वे ने बताया मनोविज्ञान
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पैसों का फैसला करते वक्त हमारा दिमाग अक्सर गणित नहीं, डर की भाषा बोलता है। बीबीसी हिंदी की एक रिपोर्ट के मुताबिक हाल में हुए एक अंतरराष्ट्रीय सर्वे में लोगों से पूछा गया — सीधे 50 हज़ार डॉलर लोगे या सिक्का उछालकर 10 लाख डॉलर जीतने का मौका लोगे? नतीजा चौंकाने वाला नहीं था: 70 फीसदी से ज्यादा लोगों ने पक्की रकम चुनी। मनोवैज्ञानिक इसे 'लॉस एवर्जन' यानी नुकसान का डर कहते हैं। नोबेल विजेता डैनियल काहनेमन और अमोस ट्वर्स्की ने दशकों पहले बताया था कि इंसान को 100 रुपये खोने का दर्द, 100 रुपये पाने की खुशी से दोगुना होता है। इसलिए जब सामने 'पक्का' और 'शायद' का मुकाबला हो, दिमाग 'पक्का' की तरफ झुक जाता है। भारतीय परिवारों में यह बात रोज दिखती है। माता‑पिता शेयर बाजार या म्यूचुअल फंड से दूर रहकर एफडी, पोस्ट ऑफिस स्कीम या सोना चुनते हैं, भले ही महंगाई के आगे रिटर्न कम हो। वजह साफ है — पूँजी डूबने का डर, बढ़ने की उम्मीद से बड़ा लगता है। एक्सपर्ट मानते हैं कि जोखिम पूरी तरह बुरा नहीं। युवावस्था में थोड़ा जोखिम लंबी अवधि में संपत्ति बनाता है। मगर फैसला डर से नहीं, लक्ष्य और समय‑सीमा देखकर होना चाहिए। वित्तीय सलाहकार अक्सर कहते हैं — 'अपनी जोखिम क्षमता जानो, फिर बाँटो।' सर्वे यह भी बताता है कि जानकारी बढ़ने पर फैसले बदलते हैं। जिन लोगों को प्रायिकता (प्रोबैबिलिटी) समझाई गई, उनमें से कइयों ने दूसरी बार टॉस का विकल्प चुना। यानी वित्तीय साक्षरता डर कम करती है। अगली बार जब ऐसा कोई विकल्प सामने आए, रुककर पूछें: 'क्या मैं डर से चुन रहा हूँ या गणित से?' जवाब आपका वित्तीय भविष्य तय कर सकता है। समाचार स्रोत: BBC हिंदी — दुनिया
समाचार स्रोत: BBC हिंदी — दुनिया

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