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पेड़ की छांव में विराजती हैं गढ़ी माई, नेपाल के मेले से जुड़ा अनोखा रिश्ता

4/9/2026, 3:03:31 am
पेड़ की छांव में विराजती हैं गढ़ी माई, नेपाल के मेले से जुड़ा अनोखा रिश्ता
बिहार के पश्चिम चंपारण जिले में एक छोटा-सा गांव है जहां बरसों से एक अनोखी आस्था का केंद्र मौजूद है। यहां किसी पक्के मंदिर में नहीं, बल्कि एक विशाल बरगद के पेड़ की छांव में गढ़ी माई विराजती हैं। स्थानीय लोग बताते हैं कि यह स्थान हजारों साल पुराना है और इसकी जड़ें नेपाल के एक प्रसिद्ध मेले से जुड़ी हुई हैं। गांव के बुजुर्गों के मुताबिक गढ़ी माई की पूजा पीढ़ियों से चली आ रही है। मूर्ति या पक्का ढांचा नहीं है, बस पेड़ के नीचे एक छोटा-सा चबूतरा और उस पर रखी गई देवी की प्रतीकात्मक प्रतिमा। श्रद्धालु यहां दूध, फूल और नारियल चढ़ाते हैं। मान्यता है कि माई मनोकामना पूरी करती हैं, खासकर संतान प्राप्ति और खेती में अच्छी फसल के लिए। इस स्थान का नेपाल से रिश्ता भी कम दिलचस्प नहीं है। हर साल कार्तिक पूर्णिमा के आसपास नेपाल के सीमावर्ती इलाके में एक बड़ा मेला लगता है। उस मेले से लौटते समय हजारों श्रद्धालु इस गांव में रुककर गढ़ी माई के दर्शन करते हैं। नेपाल के व्यापारी और किसान भी यहां माथा टेकते हैं। गांव वालों का कहना है कि यह परंपरा सदियों से चली आ रही है, जब नेपाल के तराई इलाके से लोग पैदल या बैलगाड़ी से मेला देखने आते थे। आज भी हालात बहुत नहीं बदले। पक्की सड़क बन गई है, लेकिन आस्था का स्वरूप वही है। पेड़ की डालियों पर बंधे लाल कपड़े और घंटियां इसकी गवाही देती हैं। प्रशासन ने अब यहां पेयजल और छाया की व्यवस्था की है, ताकि दूर-दराज से आने वालों को तकलीफ न हो। स्थानीय पुजारी रामप्रसाद बताते हैं, "माई के दरबार में कोई भेदभाव नहीं। हिंदू, मुसलमान, नेपाली, भारतीय — सब बराबर हैं।" गांव के युवा भी इस विरासत को सहेजने में लगे हैं। वे सोशल मीडिया पर फोटो डालकर लोगों को बुलाते हैं। यह स्थान पर्यटन के लिहाज से अभी अछूता है, लेकिन आस्था का सैलाब हर साल बढ़ता जाता है। अगर सरकार थोड़ा ध्यान दे तो यह धार्मिक पर्यटन का बड़ा केंद्र बन सकता है। समाचार स्रोत: Google News — Champaran (Hindi)
समाचार स्रोत: Google News — Champaran (Hindi)

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