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गरबा में मुस्लिम प्रवेश पर बहस: अमृता फडणवीस ने दिया बयान, राणे के शब्दों से बढ़ा विवाद
9/9/2026, 5:20:01 am

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गरबा नवरात्रि का सबसे जीवंत और रंग-बिरंगा हिस्सा होता है, जिसमें लोग घूमकर डांडिया और गरबा खेलते हैं। इस साल महाराष्ट्र के कई शहरों में गरबा कार्यक्रमों के आयोजन के साथ ही एक नई बहस छिड़ गई है। बहस का केंद्र यह प्रश्न है कि क्या मुस्लिम समुदाय के लोग भी गरबा पंडाल में प्रवेश कर सकते हैं या नहीं। इस मुद्दे पर महाराष्ट्र की पूर्व उपमुख्यमंत्री अमृता फडणवीस ने स्पष्ट तौर पर कहा कि मुस्लिमों का गरबा में आना गलत नहीं है, बल्कि यह देश की एकजुटता को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि त्योहार सभी के लिए खुला होना चाहिए और किसी भी समुदाय को बाहर रखने की कोशिश सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुंचाती है।
इस बयान के तुरंत बाद महाराष्ट्र विधान परिषद के सदस्य नितेश राणे ने एक अलग स्वर में बात की। उन्होंने कहा कि गरबा एक हिंदू धार्मिक आयोजन है और उसकी पवित्रता बनाए रखने के लिए केवल हिंदुओं को ही अनुमति देना उचित होगा। राणे के इस बयान ने सोशल मीडिया पर तेज़ प्रतिक्रिया पैदा कर दी। कई युवा और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने उनकी टिप्पणी को विभाजनकारी बताया, जबकि कुछ धार्मिक संगठनों ने उनका समर्थन किया।
विवाद के बीच कई राजनीतिक दलों ने अपनी स्थिति स्पष्ट की। शिवसेना ने कहा कि त्योहार में सभी का स्वागत होना चाहिए और इस तरह के मुद्दे को राजनीतिक लाभ के लिए नहीं उठाना चाहिए। विपक्ष में, कुछ छोटे हिंदू nationalist gruppi ने राणे की बात को सही ठहराया और कहा कि धार्मिक आयोजनों की पहचान को संरक्षित रखना आवश्यक है। इन बयानों के बाद राज्य के गृह विभाग ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक स्थानों पर आयोजित गरबा कार्यक्रमों में प्रवेश पर कोई प्रतिबंध नहीं है, लेकिन निजी आयोजकों को अपने नियम तय करने की स्वतंत्रता है।
सोशल मीडिया पर #GarbaForAll और #RespectTradition जैसे हैशट्रेंड चल रहे हैं। युवाओं का एक बड़ा वर्ग कहता है कि त्योहार में समावेशिता लाना भारत की असली ताकत है, वहीं कुछ बुजुर्ग पीढ़ी के लोग पारंपरिक सीमाओं को बनाए रखने पर जोर दे रहे हैं। इस चर्चा से स्पष्ट हो रहा है कि धार्मिक अभ्यास और आधुनिक सामाजिक मूल्यों के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं है, लेकिन बातचीत के माध्यम से ही समाधान खोजा जा सकता है।
अंत में, विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मुद्दों को सुलझाने के लिए स्थानीय समुदायों के बीच संवाद बढ़ाना आवश्यक है। जब तक हर आवाज सुनी जाएगी और सम्मान दिया जाएगा, त्योहार आपसी भाईचारे का प्रतीक बने रहेंगे।
समाचार स्रोत: अमर उजाला — भारत
समाचार स्रोत: अमर उजाला — भारत
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