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हिमालय के ग्लेशियर टिपिंग प्वाइंट के क़रीब, एक दशक में पिघलने की रफ़्तार 65% बढ़ी

17/9/2026, 5:58:42 am
हिमालय के ग्लेशियर टिपिंग प्वाइंट के क़रीब, एक दशक में पिघलने की रफ़्तार 65% बढ़ी
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हिमालय के ग्लेशियर अब टिपिंग प्वाइंट के क़रीब पहुँच चुके हैं। भारतीय विज्ञान संस्थान और वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के शोधकर्ताओं ने पाया है कि पिछले दस वर्षों में ग्लेशियरों के पिघलने की गति 65 फ़ीसद बढ़ गई है। यह आँकड़ा 2010-2020 की अवधि पर आधारित है। ब्लैक कार्बन यानी काले धुएँ के महीन कण वायुमंडल से गिरकर बर्फ़ पर जमा हो जाते हैं। ये कण सूर्य की किरणों को अवशोषित करते हैं और बर्फ़ को तेज़ी से पिघलाते हैं। अध्ययन में कहा गया है कि औद्योगिक उत्सर्जन, वाहनों का धुआँ और बायोमास जलाने से निकला ब्लैक कार्बन हिमालय के ऊँचे इलाक़ों तक पहुँच रहा है। ग्लेशियरों का तेज़ी से सिकुड़ना गंगा, सिंधु और ब्रह्मपुत्र जैसी प्रमुख नदियों के जल प्रवाह पर सीधा असर डालेगा। करोड़ों लोग इन नदियों पर खेती, पेयजल और बिजली के लिए निर्भर हैं। यदि पिघलने की यही रफ़्तार बनी रही तो आने वाले दशकों में पानी का संकट गहरा सकता है। वैज्ञानिकों ने चेताया है कि कार्बन उत्सर्जन पर तुरंत रोक लगाना ज़रूरी है। स्वच्छ ऊर्जा अपनाने, वाहनों के उत्सर्जन मानक कड़े करने और जंगलों की कटाई रोकने जैसे क़दम उठाने से ब्लैक कार्बन की मात्रा कम की जा सकती है। सरकार ने राष्ट्रीय हिमालयी अध्ययन मिशन के तहत निगरानी बढ़ा दी है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग के बिना समस्या हल नहीं होगी। जलवायु परिवर्तन पर पेरिस समझौते के लक्ष्यों को पूरा करना ही हिमालय को बचाने का एकमात्र रास्ता है।
समाचार स्रोत: अमर उजाला — भारत

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