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लोकतंत्र सूचकांक में भारत फिसला, चिदंबरम ने पूछा- 1975 के बाद सबसे कम स्कोर क्यों?
1/9/2026, 6:15:16 am

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इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट (ईआईयू) के ताजा लोकतंत्र सूचकांक में भारत की रैंकिंग गिरकर 53वें स्थान पर आ गई है। पिछले साल भारत 46वें नंबर पर था। स्कोर भी 7.04 से घटकर 6.91 रह गया। यह 1975 के आपातकाल के बाद का सबसे कम स्कोर है। सूचकांक 167 देशों को चार श्रेणियों में बांटता है — पूर्ण लोकतंत्र, त्रुटिपूर्ण लोकतंत्र, संकर शासन और अधिनायकवादी शासन। भारत अब 'त्रुटिपूर्ण लोकतंत्र' वाले समूह में है।
इस गिरावट पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने मोदी सरकार को घेरा है। उन्होंने ट्वीट करके पूछा, "1975 के बाद सबसे कम स्कोर कैसे? सरकार को जवाब देना चाहिए।" चिदंबरम ने कहा कि प्रेस की आजादी, नागरिक स्वतंत्रता और चुनावी प्रक्रिया पर दबाव बढ़ा है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकारी एजेंसियों का इस्तेमाल विपक्ष को डराने के लिए हो रहा है।
ईआईयू की रिपोर्ट के मुताबिक 2014 में जब मोदी सरकार आई थी, तब भारत 27वें स्थान पर था और स्कोर 7.92 था। तब से लगातार गिरावट जारी है। रिपोर्ट में मीडिया पर दबाव, अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा, विपक्षी नेताओं पर कार्रवाई और न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सवाल को प्रमुख कारण बताया गया है। 2022 में भारत 46वें और 2021 में 53वें स्थान पर था।
सरकार की तरफ से अभी कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। भाजपा प्रवक्ताओं ने पहले ऐसी रिपोर्टों को 'पश्चिमी मानसिकता' और 'भारत को बदनाम करने की साजिश' बताकर खारिज किया है। मगर संविधान विशेषज्ञ और पूर्व नौकरशाह मानते हैं कि संस्थाओं की स्वायत्तता पर उठे सवाल गंभीर हैं और इन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
विपक्षी दलों ने इसे बड़ा मुद्दा बनाया है। राहुल गांधी ने कहा, "लोकतंत्र की हत्या हो रही है और प्रधानमंत्री चुप हैं।" आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल और तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी ने भी तीखा हमला बोला है। नागरिक समाज के संगठन मांग कर रहे हैं कि सरकार आत्मनिरीक्षण करे और लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करने के ठोस कदम उठाए।
जानकारों का कहना है कि लोकतंत्र सूचकांक भले ही विदेशी संस्था तैयार करती है, लेकिन इसके पैमाने — चुनावी प्रक्रिया, सरकार का कामकाज, राजनीतिक भागीदारी, राजनीतिक संस्कृति और नागरिक स्वतंत्रता — भारत के अपने संविधान की कसौटी पर भी खरे उतरते हैं। गिरावट का रुख बताता है कि आंतरिक सुधार की जरूरत है। अगला सूचकांक 2025 में आएगा, तब तक सरकार के पास सुधार का वक्त है।
समाचार स्रोत: अमर उजाला — भारत
समाचार स्रोत: अमर उजाला — भारत
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