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नेपाल के ग्लेशियर: वरदान से खतरे तक, जलवायु परिवर्तन ने बदली तस्वीर

6/9/2026, 2:19:16 pm
नेपाल के ग्लेशियर: वरदान से खतरे तक, जलवायु परिवर्तन ने बदली तस्वीर
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नेपाल के पहाड़ और ग्लेशियर सदियों से देश की जीवनरेखा रहे हैं। ये बर्फीले भंडार नदियों को पानी देते हैं, खेतों को सींचते हैं और पर्यटकों को खींचते हैं। लेकिन अब वही वरदान खतरे में है। वैज्ञानिकों का कहना है कि हिमालयी क्षेत्र में तापमान वैश्विक औसत से दोगुनी रफ्तार से बढ़ रहा है। पिछले चार दशकों में नेपाल के ग्लेशियरों का लगभग एक-चौथाई हिस्सा गायब हो चुका है। इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) की रिपोर्ट बताती है कि अगर उत्सर्जन इसी गति से जारी रहा तो 2100 तक ये ग्लेशियर 80% तक सिकुड़ सकते हैं। इसका सीधा असर नीचे बसे करोड़ों लोगों पर पड़ेगा। गंगा, कोसी, गंडकी जैसी नदियों का पानी कम होगा। सिंचाई, पेयजल और बिजली उत्पादन प्रभावित होंगे। किसानों को पहले ही सूखे और बाढ़ के चक्र का सामना करना पड़ रहा है। पहाड़ी समुदायों के लिए खतरा और बड़ा है। ग्लेशियल झीलों के फटने (GLOF) की घटनाएं बढ़ रही हैं। 2021 में मेलम्ची में आई बाढ़ इसका ताजा उदाहरण है। पर्यटन क्षेत्र भी चिंतित है — पर्वतारोहण के रास्ते बदल रहे हैं, बर्फ कम होने से चढ़ाई खतरनाक होती जा रही है। नेपाल खुद कार्बन उत्सर्जन में नगण्य योगदान देता है, लेकिन जलवायु परिवर्तन की मार सबसे ज्यादा झेल रहा है। सरकार ने अनुकूलन योजनाएं बनाई हैं, लेकिन संसाधनों की कमी आड़े आती है। अंतरराष्ट्रीय मदद और उत्सर्जन कटौती के वादे ही असली समाधान हैं। वैज्ञानिक चेतावनी देते हैं: हिमालय का पिघलना सिर्फ नेपाल की समस्या नहीं, पूरे दक्षिण एशिया के जल भविष्य का सवाल है। समाचार स्रोत: BBC हिंदी — दुनिया
समाचार स्रोत: BBC हिंदी — दुनिया

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