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बंटवारे के दर्द में भी जिंदा रही इंसानियत: लाहौर के उस मकान की कहानी जो खतों से बंधी

14/8/2026, 1:46:48 pm
बंटवारे के दर्द में भी जिंदा रही इंसानियत: लाहौर के उस मकान की कहानी जो खतों से बंधी
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1947 की गर्मियों में लाहौर की गलियों में धुआं और चीखें थीं। उन्हीं दिनों चौधरी लतीफ़ के दरवाजे पर एक लिफ़ाफ़ा आया। भेजने वाले थे हरकिशन दास बेदी — वही शख़्स जो बंटवारे से पहले इस मकान के मालिक थे। खत में न शिकायत थी, न गुस्सा। बस इतनी गुज़ारिश कि घर की देखभाल करना, और अगर कभी भारत जाना हो तो उनके परिवार को ढूंढ लेना। चौधरी लतीफ़ ने खत पढ़ा, फिर जवाब लिखा। यहीं से शुरू हुआ एक ऐसा सिलसिला जो सरहदों से बड़ा निकला। दोनों परिवारों ने एक-दूसरे के सुख-दुख बांटे — शादियां, मौतें, बच्चों के जन्म। खतों का कारवां चलता रहा, भले ही डाकिए बदलते रहे, रास्ते बदलते रहे। आज तीसरी पीढ़ी उस रिश्ते को संभाले हुए है। लाहौर में चौधरी परिवार के पोते-पोतियां हरकिशन दास के नाती-पोतों से वीडियो कॉल पर बात करते हैं। उन्होंने कभी एक-दूसरे को देखा नहीं, मगर रिश्ता खून से गहरा है। यह कहानी सिर्फ दो परिवारों की नहीं। बंटवारे ने लाखों घर उजाड़े, मगर इंसानियत के कुछ कोने बचे रह गए। ये खत बताते हैं कि नफ़रत के शोर में भी मोहब्बत की आवाज़ दबती नहीं। समाचार स्रोत: BBC हिंदी — दुनिया
समाचार स्रोत: BBC हिंदी — दुनिया

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