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आज़ादी की रात एक फ़ोन कॉल ने नेहरू को बेचैन कर दिया

15/8/2026, 3:37:21 pm
आज़ादी की रात एक फ़ोन कॉल ने नेहरू को बेचैन कर दिया
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15 अगस्त 1947 की रात को दिल्ली का लाल किला रोशनी से जगमगा रहा था। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू अपने ऐतिहासिक भाषण की तैयारी में लगे थे। तभी एक फोन कॉल आई और उनका मूड अचानक बदल गया। इंदिरा गांधी ने उन्हें ढांढस बंधाते हुए कहा, “पापा, आप अपने भाषण पर ध्यान दीजिए जो आज रात देश के सामने देना है।” लेकिन नेहरू के चेहरे पर तनाव साफ दिख रहा था। कहा जाता है कि वह कॉल ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन की ओर से आई थी। खबर थी कि पंजाब और बंगाल में सांप्रदायिक हिंसा तेज हो गई है और हजारों लोग बेघर हो रहे हैं। नेहरू को इस बात का अहसास हुआ कि आज़ादी की खुशियों के साथ-साथ देश के सामने एक भयानक चुनौती भी खड़ी है। उन्होंने कुछ देर के लिए फोन रख दिया और गहरी सांस ली। इंदिरा ने फिर से उन्हें समझाया कि देश को आपके शब्दों की जरूरत है। नेहरू ने खुद को संभाला और मंच की ओर बढ़े। लाल किले की प्राचीर से उन्होंने “ट्रिस्ट विद डेस्टिनी” का ऐतिहासिक भाषण दिया, जिसमें उन्होंने कहा, “जब दुनिया सो रही थी, भारत जाग उठा।” उस भाषण ने लाखों भारतीयों को उम्मीद दी, लेकिन नेहरू के मन में उस फोन कॉल की याद लंबे समय तक बनी रही। उस रात लाल किले के सामने लाखों लोग जमा थे, उनके चेहरों पर उम्मीद और डर दोनों थे। नेहरू की आवाज़ जब माइक्रोफोन से गूंजी, तो सन्नाटा टूटा और तालियों की गड़गड़ाहट उठी। उन्होंने देश को एक नई दिशा देने का वादा किया, साथ ही विभाजन के दर्द को स्वीकार किया। उस क्षण नेहरू ने अपनी व्यक्तिगत पीड़ा को देश की आशाओं के आगे रखा। बाद के वर्षों में नेहरू ने अपनी डायरी में उस फोन कॉल का जिक्र किया और लिखा कि वह कॉल उन्हें याद दिलाती रही कि आज़ादी की कीमत केवल झंडा नहीं, बल्कि लाखों जिंदगियों की सुरक्षा है। इतिहासकारों के अनुसार यह घटना उनके शासन शैली को आकार देने में अहम साबित हुई। आज भी वह प्रसंग नेतृत्व के सामने आने वाली कठिन चुनौतियों का उदाहरण माना जाता है। समाचार स्रोत: BBC हिंदी — दुनिया
समाचार स्रोत: BBC हिंदी — दुनिया

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