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पायलटों का साल में एक से ज्यादा बार रैंडम ड्रग टेस्ट, FIP ने DGCA को दिया सुझाव

18/8/2026, 4:21:59 am
पायलटों का साल में एक से ज्यादा बार रैंडम ड्रग टेस्ट, FIP ने DGCA को दिया सुझाव
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भारतीय पायलट महासंघ (एफआईपी) ने नागर विमानन महानिदेशालय (डीजीसीए) को पत्र लिखकर पायलटों के रैंडम ड्रग टेस्ट की संख्या बढ़ाने की मांग की है। अभी नियमों के मुताबिक हर पायलट का साल में एक बार ड्रग टेस्ट होता है। एफआईपी का कहना है कि सिर्फ सालाना टेस्ट काफी नहीं है। उड़ान सुरक्षा के लिहाज से बिना पूर्व सूचना के, साल में कई बार टेस्ट होने चाहिए। संगठन के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने बताया कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई देशों में पायलटों का रैंडम टेस्ट साल में दो से चार बार होता है। भारत में भी यही पैटर्न अपनाया जाए तो नशे की लत वाले पायलट जल्दी पकड़ में आएंगे। इससे यात्रियों का भरोसा भी बढ़ेगा। डीजीसीए के मौजूदा नियमों के तहत एयरलाइंस को अपने पायलटों का सालाना मेडिकल कराना पड़ता है। इसमें ड्रग स्क्रीनिंग भी शामिल है। लेकिन यह टेस्ट पूर्वनिर्धारित होता है। पायलट को पता होता है कि कब टेस्ट होगा। एफआईपी का तर्क है कि सरप्राइज टेस्ट ही असरदार होता है। नागर विमानन मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक डीजीसीए इस सुझाव पर गंभीरता से विचार कर रहा है। अगले कुछ हफ्तों में इस पर हितधारकों से चर्चा हो सकती है। एयरलाइंस की तरफ से अभी कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन जानकार मानते हैं कि ऑपरेशनल लागत बढ़ने का हवाला देकर कुछ कंपनियां विरोध कर सकती हैं। पिछले साल एक निजी एयरलाइन के पायलट को प्री-फ्लाइट ब्रीथ एनालाइजर टेस्ट में फेल होने के बाद निलंबित किया गया था। ऐसी घटनाओं के बाद सुरक्षा मानक कड़े करने का दबाव बढ़ा है। एफआईपी ने अपने पत्र में यह भी लिखा है कि टेस्ट की प्रक्रिया पारदर्शी हो और नमूने की जांच मान्यता प्राप्त लैब में ही हो। विमानन विशेषज्ञ कैप्टन अमित सिंह कहते हैं, "रैंडम टेस्ट बढ़ाना सही दिशा में कदम है, लेकिन इसके साथ काउंसलिंग और पुनर्वास कार्यक्रम भी होने चाहिए। सिर्फ सजा देने से समस्या हल नहीं होगी।" डीजीसीए का अंतिम फैसला आने तक मौजूदा व्यवस्था जारी रहेगी।
समाचार स्रोत: अमर उजाला — भारत

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