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सऊदी अरब फांसी पाए विदेशियों के शव परिवारों को क्यों नहीं लौटाता
16/9/2026, 2:53:42 am

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सऊदी अरब दुनिया के उन तीन देशों में शामिल है जहां सबसे अधिक लोगों को मौत की सज़ा दी जाती है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार फांसी पाने वालों में बड़ी संख्या विदेशी नागरिकों की होती है, लेकिन उनके शव आमतौर पर परिजनों को नहीं सौंपे जाते। सरकारी नियमों के तहत शव को दफनाने या जलाने का काम प्रशासन खुद करता है और परिवार को सूचना तक नहीं दी जाती। मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि यह प्रथा अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन करती है और मृतक के परिजनों को अंतिम संस्कार का अधिकार छीन लेती है। सऊदी अधिकारियों ने बार‑बार दावा किया है कि शव सौंपने से सुरक्षा और धार्मिक कारणों से परहेज किया जाता है, पर कोई लिखित नीति सार्वजनिक नहीं की गई। विदेशी दूतावास अपने नागरिकों के शव वापस लाने के लिए राजनयिक दबाव डालते हैं, मगर सफलता कम ही मिलती है। पिछले साल एक भारतीय मजदूर की फांसी के बाद उसके परिवार को शव नहीं मिला, जिससे भारत में भी विरोध प्रदर्शन हुए। संयुक्त राष्ट्र ने सऊदी अरब से मांग की है कि शव परिवारों को सौंपे जाएं और प्रक्रिया पारदर्शी बनाई जाए। एमनेस्टी इंटरनेशनल के अनुसार 2023 में सऊदी अरब में 200 से अधिक लोगों को फांसी दी गई, जिनमें करीब 70 प्रतिशत विदेशी थे। सऊदी कानून में मौत की सज़ा के बाद शव को 24 घंटे के भीतर दफनाने का प्रावधान है, लेकिन परिवार को सूचना देने का कोई नियम नहीं है। भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देशों ने कई बार राजनयिक चैनल का इस्तेमाल किया, पर नतीजा सीमित रहा। सऊदी समाज के एक तबके का मानना है कि शव वापस देना धार्मिक परंपरा के विरुद्ध है, जबकि दूसरा तबका मानवाधिकार के पक्ष में आवाज़ उठाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय दबाव और घरेलू सुधार की मांग बढ़ने पर नीति में बदलाव संभव है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद ने कई बार सऊदी अरब को शव वापसी के लिए बाध्य करने का प्रस्ताव पारित किया है, लेकिन सऊदी सरकार ने इसे अपनी संप्रभुता का मामला बताकर ठुकरा दिया। यूरोपीय संघ के सदस्य देशों ने भी अपने नागरिकों के शव वापस लाने के लिए संयुक्त बयान जारी किए, पर कोई ठोस प्रगति नहीं हुई। सऊदी न्याय मंत्रालय ने हाल ही में एक आंतरिक मेमोरेंडम जारी किया जिसमें शव न सौंपने की वजह 'सुरक्षा कारणों' और 'सार्वजनिक व्यवस्था' बताई गई, लेकिन दस्तावेज़ सार्वजनिक नहीं किया गया। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि शव न मिलने से परिवार वाले न तो अंतिम संस्कार कर पाते हैं और न ही कानूनी प्रक्रिया पूरी कर पाते हैं, जिससे उन्हें लंबे समय तक अनिश्चितता में रहना पड़ता है। अंतरराष्ट्रीय कानून के जानकार बताते हैं कि शव वापसी का अधिकार 'मृतक के सम्मान' और 'परिवार के अधिकारों' के तहत आता है, जिसे नकारना मानवाधिकार उल्लंघन है। भविष्य में अगर सऊदी अरब अपने कानून में संशोधन करता है और पारदर्शी प्रक्रिया अपनाता है, तो विदेशी नागरिकों के परिजनों को राहत मिल सकती है। समाचार स्रोत: BBC हिंदी — दुनिया
समाचार स्रोत: BBC हिंदी — दुनिया
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