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शोपियां की इंशा: पैलेट गन ने छीनी रोशनी, फिर भी जिंदा है उम्मीद

25/8/2026, 1:51:01 am
शोपियां की इंशा: पैलेट गन ने छीनी रोशनी, फिर भी जिंदा है उम्मीद
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दस साल पहले जम्मू कश्मीर के शोपियां कस्बे की इंशा मुश्ताक़ की ज़िंदगी एक पल में बदल गई। 2014 में सुरक्षा बलों की कार्रवाई के दौरान पैलेट गन से निकले छर्रे उसकी आँखों में लगे जब वह स्कूल जा रही थी। अस्पताल में कई ऑपरेशन हुए लेकिन रोशनी वापस नहीं आई और डॉक्टरों ने कहा कि नुकसान स्थायी है। परिवार को इलाज के खर्च और घरेलू आमदनी की कमी से बड़ी आर्थिक तंगी झेलनी पड़ी, साथ ही समाज के कुछ तबकों ने दिव्यांगता को लेकर नकारात्मक रवैया दिखाया। इंशा ने हार नहीं मानी, उसने ब्रेल लिपि सीखी और कंप्यूटर पर टाइपिंग का अभ्यास शुरू किया। स्थानीय गैर‑सरकारी संगठनों और कुछ दोस्तों की मदद से उसे एक लैपटॉप मिला जिससे वह ऑनलाइन कक्षाएं ले सकी। आज वह दिव्यांग अधिकारों के लिए आवाज़ उठाती है और स्कूलों में जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करती है। उसकी सबसे बड़ी ख्वाहिश अब भी यही है – “काश मैं अपने माता‑पिता का चेहरा देख पाती।” इंशा सरकार से मांग करती है कि पैलेट गन का इस्तेमाल बंद हो और पीड़ितों के लिए बेहतर पुनर्वास योजना बने। उसकी कहानी दिखाती है कि शारीरिक अक्षमता के बावजूद इच्छाशक्ति और सहयोग से जीवन को नई दिशा दी जा सकती है। इंशा ने दूरस्थ शिक्षा से स्नातक की डिग्री पूरी की और अब एक ब्लॉग लिखती है जहां वह अपनी दैनिक चुनौतियों और सफलताओं को साझा करती है। उसने स्थानीय प्रशासन के सामने एक ज्ञापन सौंपा जिसमें पैलेट गन के विकल्प खोजने और पीड़ित परिवारों को आर्थिक सहायता देने की मांग की गई। कई युवा अब इंशा को प्रेरणा मानकर ब्रेल और कंप्यूटर सीख रहे हैं, जिससे समुदाय में जागरूकता बढ़ी है। विशेषज्ञों का मानना है कि पैलेट गन के उपयोग से होने वाली स्थायी अंधता को रोकने के लिए गैर‑घातक विकल्पों पर शोध जरूरी है। इंशा कहती हैं, “मेरी रोशनी भले चली गई हो, लेकिन मेरी आवाज़ और सपने अभी भी जीवित हैं।” बीबीसी हिंदी ने इंशा से बातचीत कर उसके संघर्ष और उम्मीद को दुनिया के सामने रखा। उसके प्रयासों से कई गैर‑सरकारी संगठनों ने पैलेट गन पीड़ितों के लिए विशेष सहायता कोष बनाने की पहल शुरू की है। समाचार स्रोत: BBC हिंदी — दुनिया
समाचार स्रोत: BBC हिंदी — दुनिया

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