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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: डांट-फटकार आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं

18/8/2026, 3:01:52 am
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: डांट-फटकार आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं
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सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि किसी व्यक्ति को डांटना, फटकारना या कड़े शब्द बोलना — भले ही उससे दुख पहुंचे — भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 306 के तहत आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला नहीं बनता। जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने यह टिप्पणी एक याचिका पर सुनवाई के दौरान की। मामला एक महिला की आत्महत्या से जुड़ा था। उसके पति और ससुराल वालों पर आरोप था कि उन्होंने उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित किया और फटकार लगाई, जिससे तंग आकर उसने जान दे दी। निचली अदालत और हाईकोर्ट ने आरोपियों को धारा 306 के तहत दोषी ठहराया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने फैसला पलट दिया। पीठ ने कहा, "आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध तभी बनता है जब आरोपी की ओर से ऐसा जानबूझकर किया गया कृत्य हो जो मृतक को आत्महत्या के लिए बाध्य करे। केवल डांट-फटकार, कड़े शब्द या पारिवारिक झगड़े को उकसाना नहीं माना जा सकता।" कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 306 लागू करने के लिए "उकसाने" का आशय स्पष्ट होना चाहिए — जैसे किसी को सीधे आत्महत्या के लिए कहना, उसके लिए साधन उपलब्ध कराना, या ऐसी परिस्थिति पैदा करना जहां उसके पास कोई विकल्प न बचे। रोजमर्रा की कहासुनी या पारिवारिक तनाव को इस दायरे में लाना कानून का दुरुपयोग होगा। यह फैसला उन हजारों मामलों पर असर डालेगा जहां पारिवारिक विवादों में धारा 306 लगा दी जाती है। कानून के जानकारों का मानना है कि इससे पुलिस और अदालतों को मामले की गंभीरता परखने में मदद मिलेगी और बेकसूर लोगों को फंसने से बचाया जा सकेगा। हालांकि कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर फटकार के साथ कोई ऐसा कृत्य जुड़ा हो जो सीधे आत्महत्या की ओर धकेलता हो — जैसे लगातार मानसिक उत्पीड़न, धमकी, या अपमान की हद पार करना — तो हर मामले को तथ्यों की कसौटी पर कसा जाएगा। समाचार स्रोत: अमर उजाला — भारत
समाचार स्रोत: अमर उजाला — भारत

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