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सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस से मांगा अथर खान की जमानत याचिका पर जवाब

26/8/2026, 10:19:05 pm
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस से मांगा अथर खान की जमानत याचिका पर जवाब
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दिल्ली दंगा मामला पिछले कुछ वर्षों से देश की सुर्खियों में बना हुआ है। फरवरी 2020 में हुए सांप्रदायिक हिंसा के बाद कई लोगों पर गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम, यानी UAPA के तहत मामले दर्ज किए गए। इनमें से एक आरोपी अथर खान भी हैं, जिन्हें पुलिस ने हिंसा में कथित संलिप्तता के आधार पर गिरफ्तार किया था। उनकी ओर से जमानत की याचिका लगातार अदालतों में प्रस्तुत की जा रही है। पहले निचली अदालत ने अथर खान की जमानत याचिका खारिज कर दी थी, जिस पर उन्होंने उच्च न्यायालय में अपील की। दिल्ली उच्च न्यायालय ने भी उनकी याचिका को स्वीकार नहीं किया, जिसके बाद उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली पुलिस से स्पष्ट जवाब मांगा है, ताकि यह तय किया जा सके कि जमानत देने से पहले पुलिस की जांच और सबूतों पर पर्याप्त विचार किया गया है या नहीं। न्यायमूर्ति की पीठ ने आदेश दिया कि दिल्ली पुलिस को चार सप्ताह के भीतर लिखित जवाब प्रस्तुत करना होगा। जवाब में पुलिस को बताना होगा कि किस आधार पर अथर खान के खिलाफ UAPA की गंभीर धाराएं लगाई गईं और क्या उन पर पर्याप्त सबूत हैं। साथ ही, पुलिस को यह भी स्पष्ट करना होगा कि जमानत पर रोक रखने की आवश्यकता किस हद तक है। कोर्ट ने कहा कि यदि जवाब संतोषजनक नहीं पाया गया तो वह जमानत पर पुनर्विचार कर सकता है। विधि विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले में पुलिस का उत्तर निर्णायक साबित हो सकता है। यदि पुलिस अपने तर्कों को मजबूत सबूतों के साथ पेश करती है, तो अदालत जमानत देने से इंकार कर सकती है। विपरीत स्थिति में, यदि जवाब कमजोर पाया गया तो अथर खान को राहत मिलने की संभावना बढ़ जाती है। इस प्रक्रिया से न केवल एक व्यक्तिगत मामले का fate तय होगा, बल्कि UAPA के व्यापक उपयोग पर भी सवाल उठ सकते हैं। दिल्ली दंगे के संबंध में अब तक dozens लोगों पर मामले चल रहे हैं, और कई आरोपियों की जमानत याचिकाएं लंबित हैं। इस प्रकरण का परिणाम अन्य समान मामलों पर असर डाल सकता है। मानवाधिकार संगठनों ने बार‑बार कहा है कि UAPA का प्रयोग कभी‑कभी राजनीतिक लक्ष्यों की पूर्ति के लिए किया जाता है, जबकि सरकार इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आवश्यक बताती है। शीर्ष अदालत का यह कदम दिखाता है कि वह कानून और स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है। समाचार स्रोत: अमर उजाला — भारत
समाचार स्रोत: अमर उजाला — भारत

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