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450 साल पुराने मर्केटर नक्शे को बदलने का यूएन प्रस्ताव: अफ्रीका और भारत को सही आकार मिलेगा?

3/9/2026, 10:38:12 pm
450 साल पुराने मर्केटर नक्शे को बदलने का यूएन प्रस्ताव: अफ्रीका और भारत को सही आकार मिलेगा?
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संयुक्त राष्ट्र की yleasst सामान्य सभा में एक प्रस्ताव रखा गया है जो 450 साल पुराने मर्केटर प्रोजेक्शन को बदलने की बात करता है। इस प्रस्ताव का मकसद दुनिया के मानचित्र को अधिक सटीक बनाना है, ताकि महाद्वीपों और देशों के वास्तविक आकार सही दिख सकें। मर्केटर प्रोजेक्शन 1569 में जेरार्डस मर्केटर ने बनाई थी और तब से इसे नेविगेशन के लिए व्यापक रूप से इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि यह विकृति पैदा करता है, विशेषकर ध्रुवों के पास के क्षेत्रों को बहुत बड़ा दिखाता है। इसलिए अफ्रीका जैसे देश वास्तव में से छोटे नजर आते हैं। नए प्रस्ताव में Equal Earth प्रोजेक्शन को अपनाने की सलाह दी गई है। यह प्रोजेक्शन समान क्षेत्रफल को बनाए रखता है, यानी प्रत्येक क्षेत्र का आकार उसके वास्तविक अनुपात में दिखता है। इससे अफ्रीका का वास्तविक विस्तार स्पष्ट हो जाएगा। भारत की बात करें तो मर्केटर में भारत का आकार थोड़ा सिकुड़ा दिखता है, जबकि वास्तव में यह एशिया का सातवां सबसे बड़ा देश है। Equal Earth में भारत का सही अनुपात दिखेगा, जो उसकी भौगोलिक महत्व को उजागर करेगा। इस बदलाव से शिक्षा, नीति बनाने और अंतर्राष्ट्रीय समझ पर प्रभाव पड़ेगा। स्कूली किताबों में मानचित्र बदलने से छात्रों को सही भौगोलिक ज्ञान मिलेगा। साथ ही विकास सहायता और जलवायु नीतियों में संसाधनों का分配 अधिक न्यायसंगत हो सकता है। यूएन सदस्य देशों में इस प्रस्ताव पर चर्चा चल रही है। कुछ देश पुराने मानचित्र से जुड़ी परंपरा और ऐतिहासिक कारणों से बदलाव में हिचकिचा रहे हैं। वहीं कई विकासशील राष्ट्र इस कदम को अपनी सही पहचान स्थापित करने के अवसर के रूप में देख रहे हैं। अगर प्रस्ताव मंजूर हो जाता है, तो यूएन के सभी ufficiali दस्तावेज़, रिपोर्ट्स और ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म्स में नया मानचित्र लागू किया जाएगा। यह परिवर्तन एक साथ कई प्लेटफ़ॉर्म्स पर लागू होगा, जिससे एकरूपता बनी रहेगी। विशेषज्ञों का कहना है कि Equal Earth प्रोजेक्शन में ध्रुवों का आकार भी अधिक वास्तविक दिखता है, जबकि मर्केटर में वे अनावश्यक रूप से फैल जाते हैं। इससे ध्रुवीय क्षेत्रों के अध्ययन में भी सुधार आएगा। भारत की सरकारी एजेंसियों ने भी इस मुद्दे पर ध्यान देना शुरू कर दिया है। मानचित्र विज्ञान विभागों में चर्चा चल रही है कि राष्ट्रीय स्तर पर किस प्रोजेक्शन को अपनाया जाए। हालांकि अंतिम फैसला अंतर्राष्ट्रीय संगठनों पर निर्भर रहेगा। यदि बदलाव होता है, तो यह सिर्फ तकनीकी सुधार नहीं होगा; यह दुनिया के सामने आने वाली असमानताओं को सही करने की एक प्रतीकात्मक पहल भी मानी जा सकती है। सही आकार दिखाना सच्चाई के प्रति प्रतिबद्धता का संकेत है। अंत में, इस प्रस्ताव पर मतदान की तारीख अभी तय नहीं हुई है, लेकिन चर्चा तेजी से बढ़ रही है। दुनिया भर के नागरिकों, शिक्षाविदों और नीति निर्माताओं की निगरानी इस पर रहेगी कि क्या मानचित्र finalmente न्याय के करीब आएगा। समाचार स्रोत: अमर उजाला — विश्व
समाचार स्रोत: अमर उजाला — विश्व

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