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भारत

जंतर मंतर से रांची तक: युवा आक्रोश का सियासी दलों पर क्या असर?

14/8/2026, 11:53:24 pm
जंतर मंतर से रांची तक: युवा आक्रोश का सियासी दलों पर क्या असर?
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इस हफ्ते दिल्ली के जंतर मंतर और झारखंड की राजधानी रांची में युवाओं ने जमकर प्रदर्शन किया। उनके हाथों में पोस्टर थे जिन पर बेरोजगारी, शिक्षा की कमी और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे लिखे गए थे। प्रदर्शनकारियों ने कहा कि उनकी आवाज अनसुनी की जा रही है और वे बदलाव की मांग कर रहे हैं। इन घटनाओं पर प्रतिक्रिया देते हुए, अमर उजाला के कार्यक्रम "खबरों के खिलाड़ी" में वरिष्ठ पत्रकार विनोद अग्निहोत्री, पीयूष पंत, पूर्णिमा त्रिपाठी, राकेश शुक्ल और एसके दत्ता ने हिस्सा लिया। पैनल ने चर्चा की कि युवा आक्रोश केवल भावनात्मक outflow नहीं है, बल्कि यह स्पष्ट संकेत दे रहा है कि मौजूदा नीतियों में गहरी खामियां हैं। विनोद अग्निहोत्री ने कहा कि दिल्ली में प्रदर्शन ज्यादातर शहरी युवाओं की है, जो निजी क्षेत्र में रोजगार की कमी और जीवन लागत में वृद्धि से परेशान हैं। जबकि रांची में प्रदर्शन मुख्य रूप से ग्रामीण पृष्ठभूमि वाले छात्रों द्वारा नेतृत्व किया जा रहा है, जो भूमि अधिग्रहण और स्थानीय संसाधनों के दोहन के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। पीयूष पंत ने जोर देकर कहा कि सियासी दलों को इन मुद्दों पर तुरंत प्रतिक्रिया देनी चाहिए, नहीं तो वे आगामी चुनावों में erheblich नुकसान उठा सकते हैं। पूर्णिमा त्रिपाठी ने सुझाव दिया कि दलों को युवाओं के साथ सीधा संवाद स्थापित करना चाहिए, उनके मुद्दों को नीति बनाने की प्रक्रिया में शामिल करना चाहिए। राकेश शुक्ल ने चेतावनी दी कि यदि आक्रोश को अनसुना किया गया तो यह सामाजिक अशांति का रूप ले सकता है, जबकि एसके दत्ता ने बताया कि सोशल मीडिया के माध्यम से ये संदेश तेजी से फैल रहे हैं, जिससे पारंपरिक चुनावी कैम्पेन पर भी असर पड़ रहा है। अंत में सभी विशेषज्ञों ने सहमति जताई कि युवा आक्रोश सिर्फ एक क्षणिक घटना नहीं है, बल्कि यह एक लंबी अवधि की सामाजिक मांग है जिसे नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है। समाचार स्रोत: अमर उजाला — भारत
समाचार स्रोत: अमर उजाला — भारत

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