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हिंदी: बहती नदी से ठहरे तालाब तक का सफर, कैसे लौटे रवानी?

12/9/2026, 11:37:47 pm
हिंदी: बहती नदी से ठहरे तालाब तक का सफर, कैसे लौटे रवानी?
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हिंदी आज एक चौराहे पर खड़ी है। कभी बहती नदी की तरह यह भाषा नए शब्द, बोलियां और अभिव्यक्तियाँ अपनाती चलती थी। आज कई जानकार मानते हैं कि यह ठहरे तालाब जैसी होती जा रही है — शुद्धतावाद के नाम पर इसमें नयापन रुक गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि हिंदी की ऊर्जा उसके लचीलेपन में थी। भोजपुरी, अवधी, ब्रज, राजस्थानी जैसी बोलियों से शब्द लेते हुए यह समृद्ध हुई। मगर बीते दशकों में एक खास किस्म का दुराग्रह हावी हुआ। संस्कृतनिष्ठ शब्दों को ही 'शुद्ध' मान लिया गया। आम बोलचाल के शब्द, उर्दू-फारसी के चलन वाले लफ्ज़, अंग्रेजी के स्वीकृत शब्द — सबको 'अशुद्ध' ठहरा दिया गया। नतीजा: स्कूल-कॉलेज की पाठ्यपुस्तकों से लेकर सरकारी दफ्तरों की भाषा तक, एक कृत्रिम, बोझिल हिंदी थोप दी गई। यही नहीं, अंग्रेजी का दबदबा बढ़ने से युवा पीढ़ी हिंदी से दूर होती गई। रोजगार, तकनीक, उच्च शिक्षा — हर जगह अंग्रेजी ही पासपोर्ट बनी। हिंदी साहित्य के पाठक घटे, पत्रिकाएँ बंद हुईं, नई पीढ़ी के लेखकों को मंच नहीं मिला। डिजिटल दुनिया में भी हिंदी की मौजूदगी ज्यादातर अनुवाद या रोमन लिपि तक सिमटी रही। लेकिन तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक नहीं। सोशल मीडिया, यूट्यूब, पॉडकास्ट पर हिंदी नए रूप में फल-फूल रही है। हिंग्लिश, बोलियों का मिश्रण, लोकभाषाओं का डिजिटल दस्तावेजीकरण — ये सब भाषा को फिर से बहाव दे रहे हैं। कई युवा लेखक अपनी मातृभाषा की बोलियों में लिख रहे हैं, और पाठक मिल रहे हैं। जरूरत इस बात की है कि हिंदी को 'शुद्धता' के खांचे से निकालकर 'जीवंतता' की कसौटी पर कसा जाए। अकादमियाँ, प्रकाशक, शिक्षा बोर्ड — सबको मिलकर तय करना होगा कि भाषा का मानकीकरण उसका गला न घोंट दे। बोलियों को मान दें, नए शब्द गढ़ें, तकनीकी शब्दावली सहज बनाएँ। तभी हिंदी फिर से बहती नदी बन सकेगी। समाचार स्रोत: अमर उजाला — भारत
समाचार स्रोत: अमर उजाला — भारत

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