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ब्रिक्स में भारत की राह: पश्चिम विरोधी गुट रोकने की चुनौती

12/9/2026, 3:59:26 am
ब्रिक्स में भारत की राह: पश्चिम विरोधी गुट रोकने की चुनौती
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जोहान्सबर्ग में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के बाद नई बहस छिड़ी है। क्या इस समूह से भारत को वास्तविक लाभ मिल रहा है? जानकारों का कहना है कि नई दिल्ली का मुख्य मकसद ब्रिक्स को पश्चिम-विरोधी खेमे में बदलने से रोकना है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साफ किया कि ब्रिक्स किसी के खिलाफ नहीं है। लेकिन रूस, चीन और ईरान जैसे सदस्य खुलकर पश्चिमी देशों को चुनौती दे रहे हैं। ऐसे में भारत की संतुलन साधने की कोशिश कितनी कामयाब होगी, इस पर सवाल हैं। चीन ब्रिक्स को G7 के मुकाबले खड़ा करना चाहता है। रूस यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिम से अलग-थलग है। ईरान भी अमेरिकी प्रतिबंधों से परेशान है। तीनों मिलकर समूह का रुख मोड़ सकते हैं। भारत के लिए यह दोधारी तलवार है। आर्थिक मोर्चे पर ब्रिक्स न्यू डेवलपमेंट बैंक से भारत को कर्ज मिला है। स्थानीय मुद्रा में व्यापार की बात भी आगे बढ़ी है। मगर चीन का दबदबा इसमें बना हुआ है। भारतीय निर्यातकों को चीनी बाजार में अब भी मुश्किलें आती हैं। रणनीतिक स्वायत्तता भारत की पुरानी नीति है। ब्रिक्स में रहकर भारत ग्लोबल साउथ की आवाज बनना चाहता है। साथ ही क्वाड और जी20 जैसे मंचों पर पश्चिम के साथ भी काम कर रहा है। यह दोहरी रणनीति कब तक चल पाएगी, विशेषज्ञ बंटे हुए हैं। कुछ विश्लेषक कहते हैं कि ब्रिक्स विस्तार से भारत का प्रभाव कम होगा। नए सदस्यों में अधिकतर चीन के करीब हैं। दूसरों का मानना है कि बड़े मंच पर बैठकर ही भारत अपनी बात रख सकता है। फैसला वक्त करेगा। फिलहाल नई दिल्ली सधे कदमों से चल रही है। ब्रिक्स को विकास और सुधार का मंच बनाए रखने की कोशिश जारी है। लेकिन भू-राजनीति की बदलती बिसात पर भारत की भूमिका की असली परीक्षा अब शुरू हुई है। समाचार स्रोत: BBC हिंदी — दुनिया
समाचार स्रोत: BBC हिंदी — दुनिया

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