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राजस्थान के मुख्य न्यायाधीश पर लगे आरोप और हाईकोर्ट जज को हटाने की प्रक्रिया

29/8/2026, 12:40:18 am
राजस्थान के मुख्य न्यायाधीश पर लगे आरोप और हाईकोर्ट जज को हटाने की प्रक्रिया
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राजस्थान उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश आजकल मीडिया की सुर्खियों में हैं। उन पर गंभीर आरोप लगे हैं जिनकी जांच शुरू हो चुकी है।\n\nआरोपों में न्यायिक कार्यप्रणाली में पक्षपात, वित्तीय अनियमितताएं और प्रशासनिक दबाव डालने के आरोप शामिल हैं। कई वकीलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने उच्चतम न्यायालय तथा राष्ट्रपति को शिकायती पत्र लिखे हैं।\n\nभारतीय संविधान के अनुच्छेद 217 और 124 में हाईकोर्ट के जज को पद से हटाने की प्रक्रिया तय की गई है। इस प्रक्रिया को महाभियोग कहा जाता है और इसमें संसद के दोनों सदनों की सहमति आवश्यक है।\n\nपहले राष्ट्रपति एक जांच समिति गठित करते हैं जिसमें सर्वोच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश, एक उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और एक प्रख्यात विधिवेत्ता होते हैं। समिति की रिपोर्ट संसद में पेश की जाती है।\n\nसंसद में प्रस्ताव पर चर्चा के बाद मतदान होता है। यदि लोकसभा और राज्यसभा दोनों में दो‑तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पारित हो जाता है, तो राष्ट्रपति आदेश जारी कर जज को पदमुक्त कर देते हैं।\n\nअब तक देश में केवल कुछ ही जजों के खिलाफ महाभियोग प्रक्रिया पूरी हुई है। राजस्थान के मामले में जांच अभी प्रारंभिक चरण में है और कोई अंतिम फैसला नहीं लिया गया है।\n\न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए पूरी प्रक्रिया पारदर्शी और समयबद्ध रखी जाती है। आम नागरिक को यह जानना ज़रूरी है कि न्यायाधीश भी कानून के दायरे में आते हैं।\n\किसी भी आरोप की निष्पक्ष जांच ही लोकतंत्र की मजबूती का आधार है।\n\शिकायतकर्ताओं ने एक विशेष मामले में मुख्य न्यायाधीश पर अपने निकट संबंधी को अनुचित लाभ देने का आरोप लगाया है। इस मामले की जांच के लिए उच्चतम न्यायालय ने एक स्वतंत्र समिति बनाने का निर्देश दिया है।\n\मुख्य न्यायाधीश ने आरोपों को निराधार बताया है और कहा है कि वे जांच में पूरा सहयोग करेंगे। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायपालिका की गरिमा बनाए रखना उनकी प्राथमिकता है।\n\संविधान के अनुच्छेद 124(4) में महाभियोग की प्रक्रिया विस्तार से दी गई है। इसके अनुसार राष्ट्रपति केवल संसद के प्रस्ताव पर ही जज को पदमुक्त कर सकते हैं। इस प्रक्रिया में किसी भी राजनीतिक हस्तक्षेप की गुंजाइश नहीं रखी गई है।\n\पिछले दो दशकों में केवल दो जजों के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव संसद में लाया गया था, लेकिन दोनों बार प्रस्ताव पारित नहीं हो सका। इससे स्पष्ट होता है कि जज को हटाना अत्यंत कठिन और दुर्लभ घटना है।\n\नागरिक समाज और विधि विशेषज्ञ इस मामले पर नज़र रख रहे हैं। उनका मानना है कि पारदर्शी जांच और समयबद्ध कार्रवाई से न्यायपालिका में जनता का विश्वास मजबूत होगा।\n\समाचार स्रोत: अमर उजाला — भारत
समाचार स्रोत: अमर उजाला — भारत

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