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जीडीपी वृद्धि पर सुभाष गर्ग का सवाल: क्या आंकड़े सच बोलते हैं?

3/9/2026, 8:22:31 am
जीडीपी वृद्धि पर सुभाष गर्ग का सवाल: क्या आंकड़े सच बोलते हैं?
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भारत की ताजा जीडीपी वृद्धि दर जारी होते ही पूर्व वित्त सचिव सुभाष गर्ग ने उस पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि जीडीपी केवल कुल इनपुट और आउटपुट की कीमत जोड़ती है, यह नहीं बताती कि उत्पादन कौन कर रहा है और लाभ किसे मिल रहा है। उनके मुताबिक यही जीडीपी की बुनियादी कमी है, क्योंकि यह असमानता और अनौपचारिक क्षेत्र के योगदान को छुपा लेती है। सरकारी आंकड़ों में पिछली तिमाही में 7.8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, लेकिन कई विश्लेषक मानते हैं कि यह संख्या वास्तविक आर्थिक गतिविधि से मेल नहीं खाती। गर्ग ने सुझाव दिया कि नीति निर्माताओं को रोजगार, आय वितरण और पर्यावरणीय प्रभाव जैसे संकेतकों पर भी ध्यान देना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक भी जीडीपी के पूरक के रूप में मानव विकास सूचकांक और गरीबी दर का उपयोग करने की सलाह देते हैं। विशेषज्ञ कहते हैं कि केवल एक संख्या पर भरोसा करने से नीति गलत दिशा में जा सकती है, खासकर जब असंगठित क्षेत्र का बड़ा हिस्सा अनदेखा रहता है। इस बहस ने सांख्यिकी मंत्रालय को अपनी पद्धति की समीक्षा के लिए प्रेरित किया है, ताकि आंकड़े अधिक पारदर्शी हों। आम नागरिक के लिए जीडीपी वृद्धि का सीधा असर महंगाई, रोजगार और सार्वजनिक सेवाओं पर पड़ता है, इसलिए सटीक माप जरूरी है। पिछले कुछ वर्षों में बेस वर्ष 2011‑12 के बाद जीडीपी की गणना में कई संशोधन हुए हैं, जिससे तुलना कठिन हो गई है। नाममात्र जीडीपी और वास्तविक जीडीपी के बीच अंतर भी भ्रम पैदा करता है, क्योंकि मुद्रास्फीति का असर अलग‑अलग क्षेत्रों में अलग होता है। कई अर्थशास्त्री मानते हैं कि रोजगार सृजन और मजदूरी वृद्धि जैसे संकेतक जीडीपी से अधिक विश्वसनीय हैं। सरकार ने हाल ही में राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय को डेटा संग्रह प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ाने के निर्देश दिए हैं। नागरिक समाज और शोध संस्थान भी स्वतंत्र ऑडिट की मांग कर रहे हैं ताकि आंकड़ों पर भरोसा कायम रहे। समाचार स्रोत: BBC हिंदी — दुनिया
समाचार स्रोत: BBC हिंदी — दुनिया

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